रविवार, 15 फ़रवरी 2026

कहीं और चला जा

 

मत कर नया समर, तू कहीं और चला जा

अब छोड़ ये डगर तू कहीं और चला जा।


जो ज़ख़्म पे मरहम हो, शफ़ा हो शुकून हो 

ये वो नहीं है घर, तू कहीं और चला जा।


खुदगर्ज़ बस्तियों में फ़रेबों के मकाँ हैं 

'उनका' है ये शहर तू कहीं और चला जा।


सबसे बड़ा फ़रेब है ख़ुद ज़िंदगी यहाँ 

फिर भी ग़िला न कर, तू कहीं और चला जा।


उनका हुआ तो उनका ही हो जा रे आदमी 

मत कर इधर उधर, तू कहीं और चला जा।


ये ख़्वाब-ओ-हक़ीकत, ये फ़साने, ये फ़लसफे 

अब यार बस भी कर, तू कहीं और चला जा।


आराम भी, सुकून भी, इज़्ज़त भी, इश्क़ भी 

इतना न तंग कर, तू कहीं और चला जा।


'आनंद' का कुछ हाल तो मालूम ही होगा 

न ज़र न घर न दर, तू कहीं और चला जा।




©आनंद

15 फरवरी 2026.

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 16 फ़रवरी 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  2. वाह!! 'वह कहीं और' तो उसका ही दर है, वरना भटकना यहाँ दर-बदर है

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  3. यह कविता दिल की गहरी थकान और टूटे भरोसे की बात बहुत सरल लेकिन असरदार शब्दों में कहती है। “तू कहीं और चला जा” बार-बार कहना ऐसा लगता है जैसे कोई खुद से ही कह रहा हो कि अब यहाँ रुकना ठीक नहीं। जहाँ अपनापन नहीं, सुकून नहीं, सच नहीं—वहाँ से दूर हो जाना ही बेहतर है।

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