शनिवार, 31 दिसंबर 2011

जिंदगी की दास्ताँ, बस दास्तान-ए-ग़म नही



जिंदगी की दास्ताँ, बस दास्तान-ए-ग़म नही
इम्तहाँ भी कम नही, तो हौसले भी कम नही

करने वाले मेरे सपनों की तिजारत कर गये
हम सरे-बाज़ार थे पर हुआ कुछ मालुम नही

कुछ नकाबें नोंच डालीं वक़्त ने,  अच्छा हुआ
जो भी है अब सामने, गफ़लत तो कम से कम नही 

अय ज़माने के खुदाओं  अपना रस्ता नापिए
अब किसी भगवान के रहमो-करम पर हम नही

अब जहाँ जाना  है लेकर वक़्त मुझको जाएगा
मौत महबूबा है, लेकिन ख़ुदकुशी लाज़िम नही

रंज मुझको ये नहीं, कि क्यों गया तू छोड़कर
रंज ये है,  क्यों तेरे जाने का रंज-ओ-गम नहीं

अपने अब तक के सफ़र में खुद हुआ मालूम ये
लाख अच्छे हों,  मगर ऐतबार लायक हम नही

हिज्र की बातें करे या, वस्ल का चर्चा करे
आजकल 'आनंद' की बातों में वैसा दम नही

-आनंद द्विवेदी ३१/१२/२०११

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

डिफेक्टिव आइटम !



डिफेक्टिव आइटम !

मुझे
जरा बाद में पता चला
पर तुम्हे तो मालूम था ....
फिर
क्यों भेज दिया
मुझ जैसे डिफेक्टिव आइटम को
यहाँ ...? बोलो
क्वालिटी वालों के यहाँ भी  आर टी आई  लगाया
तो कहते हैं
प्रोडक्शन  में पता करो
यहाँ से ओ के  है रिपोर्ट
अब प्रोडक्शन में ....
अपने ब्रह्मा जी ...बुजुर्ग आदमी
वर्कलोड रोज का रोज बढ़ता जा रहा है
इन्फ्रास्टक्चर  वही पुराना
हो गयी चूक ....
पर अपना तो बैंड बज गया न !

फिर मैंने सोंचा
चलो रिजेक्ट का टैग तो लग ही गया है
शंकर जी को अप्रोच किया
भाई वापसी का जिम्मा तो उन्ही का है न
उफ्फ्फ
सालों इंतज़ार करो
कब जरा होश में हों तो अपनी बात कहूँ
कुछ पता ही नही चलता
एक दिन माँ ने
मेरी अर्जी  रख़ दी सामने
तो बोले
भगाओ.... इसे  
अभी यहाँ सारे अपने 'गणों' को खराब कर देगा
आदमी ठीक नही है
जानती हो तुम ...ये पागल भी प्रेम स्रेम वाला ......
और अभी इसका टाइम भी नही है
यहाँ आने का

अब तुम बताओ
माधव !
मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट का आइटम
कम्पनी वापस ले नही रही ...
अब आजकल इतना टफ कम्पटीशन
मार्केट में चल सकता नही
तो क्यों धक्के खिलवा रहे हो
इधर से उधर
इस दूकान से उस दूकान
..............
इसे मार्केट से उठा लो न
आखिर
मैंने सुना है
हर खोटा सिक्का
आपके पास आकर खरा हो जाता है
मुझे खरा नही होना
बस मुझे
चलन से बाहर कर दो
यही एक इल्तजा है
अब मत तड़पाओ माधव !!

-आनंद द्विवेदी २९/१२/२०११


रविवार, 25 दिसंबर 2011

"२०११" ...एक अन्तरंग बातचीत !




प्रिय २०११ !
जा रहे हो न
कभी नही आओगे अब
तुम्हारी तरह के ४३ और वर्ष
जा चुके हैं ऐसे ही
केवल समय के गतिमान होने का
बोध कराते हुए
मगर तुम !
तुमने जो दिया है
जो सौगातें
जो नेमतें
वो अद्वितीय हैं

तुम
बहुत हसीन थे
बहुत शक्तिशाली भी
मगर नियति को बदलने की क्षमता
नही थी तुम में भी

तुमने ही पहली बार बताया कि
खुशबू किसे कहते हैं
हवाएं कैसे गाती हैं
आसमान से गिरती बरसात की बूंदों में
पानी और शराब का अनुपात कितना होता है
तुमने ही बताया कि
जो आनंद पागल होने में है
वो होश में कहाँ ....
और ये भी कि
एक जोड़ी आँखों में
सारी दुनिया कि शराब से
ज्यादा नशा कैसे होता है
और फिर ये भी कि
एक जोड़ी आँखों में ही
एक सागर से ज्यादा
पानी
कैसे आ जाता है !

तुमने जाते जाते
अपना सबसे नायाब तोहफा दिया मुझे ...
फकीरी का
कुछ होने में वो सुख कहाँ
जो 'कुछ न' होने में है
मेरा यह अनुपम आनंद
केवल वही महसूस कर सकता है
जिसके पास........ कुछ न हो
पकड़ने में
वो आनंद कहाँ
जो छोड़ देने में है
पाने में वो मस्ती कहाँ
जो खो देने में है ...!

एक छोटी सी कसक
फिर भी है
तुम हर जाने वाले कि तरह
इतनी हड़बड़ी में क्यों हो
कुछ और ठहरते तो .....?
तुम्हें अच्छे से पता है कि
मुझको .....
इतनी जल्दी
किसी भी बात की
सालगिरह मनाना
जरा भी
अच्छा नही लगेगा !

खैर छोड़ो
मैं तुम्हें पूरे मन से विदाई देता हूँ
अब विदा
हमेशा के लिए !!!

-आनंद द्विवेदी  २५/१२/२०११



  

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

मेरा उठना... मेरा बैठना




मेरा उठना
मेरा बैठना 
मेरा बोलना
मेरी मौन 
मेरा हंसना 
मेरा रोना 
सब
तेरी ही तो अभिव्क्ति है
मेरा सारा जीवन
तेरा ही एक गीत है माधव !
इसे मैं जितना
शांत
और शांत होकर सुनता हूँ
तू उतना ही मेरे अंदर
गहरे
और गहरे
नाचने लगता है !!

लोग कहते हैं ....कि
तू
बहुत विराट है ,
"रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्माण्ड "
उफ्फ्फ
मैं तो डर ही जाऊंगा
मेरे से
इतना कहाँ संभलेगा
वैसे भी
मुझे इस तरह कि बातें
जरा भी अच्छी नहीं लगती
मैं जानता हूँ .... कि मैं
तुझे समझ नहीं सकता
(समझना चाहता भी नहीं )
पर मैं
तुझे जी सकता हूँ
जी रहा हूँ मैं
तुझे  !


इधर देख ... वैसे ही प्यार भर कर
और  कर दे ...पागल
अब होश में रहने का
जरा भी मन नहीं !

-आनंद द्विवेदी ९/१२/२०११

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

आ जिंदगी तू आज मेरा कर हिसाब कर ..



आ जिंदगी तू आज मेरा कर हिसाब कर
या हर जबाब दे मुझे  या लाजबाब कर 

मैं  इश्क  करूंगा  हज़ार  बार करूंगा
तू जितना कर सके मेरा खाना खराब कर

या छीन  ले नज़र कि कोई ख्वाब न पालूं
या एक काम कर कि मेरा सच ये ख्वाब कर

या मयकशी से मेरा कोई वास्ता न रख
या ऐसा नशा दे कि मुझे ही शराब कर 

जा चाँद से कह दे कि मेरी छत से न गुजरे
या फिर उसे मेरी नज़र का माहताब कर

क्या जख्म था ये चाक जिगर कैसे बच गया  
कर वक़्त की कटार पर तू और आब कर

खारों पे ही खिला किये है गुल, ये सच है तो
'आनंद' के ग़मों को ही तू अब  गुलाब कर  |

-आनंद द्विवेदी २९-११-२०११

सोमवार, 28 नवंबर 2011

इतना काफी है एक उम्र बिताने के लिए



दौर-ए-गर्दिश में मुझे राह दिखाने के लिए
शुक्रिया आपका हर साथ निभाने के लिए

जिंदगी लौट के आया हूँ अंजुमन में तेरे
अब किसी गैर के कूचे में न जाने के लिए

बेरहम वक़्त से उम्मीद भला क्या करना
खुद ही जलना है यहाँ शम्मा जलाने के लिए

कसमे वादे, हसीन ख्वाब और रंज-ओ-ग़म
छोड़ आया हूँ मैं, ये काम जमाने के लिए

एक बेनाम सा अहसास और एक कसक
इतना काफी है एक  उम्र बिताने के लिए

थोड़े यादों के फूल थे,  जो बचा रक्खे थे
ये भी ले जाता हूँ मंदिर में चढ़ाने के लिये

साथ  'आनंद' का  अब  कौन भला चाहेगा
हाथ में कुछ नहीं दुनिया को दिखाने के लिए

-आनंद द्विवेदी २७/११/२०११

शनिवार, 26 नवंबर 2011

हे राधा माधव हे कुञ्जबिहारी !



हे वृषभान नंदिनी !
लोग कहते हैं
आप और वो
एक ही हैं
एक दूसरे में समाये हुए
अपृथक
ऐसा है तो
आप को तो सब पता ही होगा न
मुझ पर करुणा कर माँ
एक बार ...बस एक बार
बोल उनको
निहार लें उसी बांकी चितवन से
जिससे नज़रें मिलने के बाद
और सब कुछ
भूल जाता है फिर !



और माधव !
तुम
शरणागत को
कैसे डील करते हो यार  ?
"सर्व धर्मान परित्यज्य
मामेकं शरणं ब्रज "
बस बातें लेलो 'तेरह सौ की'
छुड़ाओ न सब ...
मेरे बस का होता तो
क्यों चिरौरी करता
बार बार तुमसे ...

वैसे एक बात बोलूं
तुम्हारी आँखों में न
काजल बहुत जमता है
मैं तो
जब भी देखता हूँ न
सेंटी हो जाता हूँ  !!  :) :)

२६/११/२०११

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

रंग दे ..छलिया !

अब ... जब तक हमारे बीच से शब्द एकदम ख़तम नहीं हो जाते..... ये "तू तू मैं मैं" तो चलती ही रहेगी यही सोंच कर आज से इस सीरीज की शुरुआत कर रहा हूँ ....केवल अपने लिए है यह ..अगर इस जन्म में पा लिया उन्हें तो कोई और पढ़ेगा ये मीठी यादें ..और अभी कई और जन्म लेने पड़े तो मैं फिर लौट कर आऊंगा और पढूंगा इन सब कवितों को एक बार फिर .......

रंग दे ..छलिया !

जैसा
तेरा नाम है न
वैसा ही
तेरा रंग !
और जब तू पीला-पीला
पीताम्बर पहनता है ना
बाई गाड
दूर से ही चमकता है |
यार तुझे भी ना
जरा भी ड्रेस सेन्स  नहीं है ...
ऊपर से ये
'बरसाने वाली'...
ध्यान ही नहीं रखती
किसी बात का !!

सर्दियाँ आ गयी हैं
अब तू
थोडा टाइम दे
तो
सीख लूं मैं
स्वेटर बुनना
अपनी पसंद के सारे रंग
बुन दूं मैं
तेरे लिए
तू पहनेगा ना ..
मेरा बुना हुआ झगोला ..?

अरे सुन !
तुझे वो गाना आता है क्या ..
'रंगरेज़ा.. .रंगरेज़ा'  वाला
बजा रे... बजा ना एक बार
देखूं  बांसुरी पर ..
कैसा लगता है
रंगरेज़ा रंग मेरा तन मेरा मन 
ले ले रंगाई चाहे तन चाहे मन ......

रंग दे छलिया
क्यों तड़पाता है अब  !!

२४-११-२०११

बुधवार, 23 नवंबर 2011

मैं मोहब्बत का चलन क्यों भूलूँ


तेरे मदहोश नयन क्यों भूलूँ
तेरा चंदन सा बदन क्यों भूलूँ

तू मुझे भूल जा तेरी फितरत
मैं तुझे मेरे सनम क्यों भूलूँ

जिस्म  से रूह तक उतर आई
तेरे होंठों की तपन क्यों भूलूँ

आज खारों पे शब कटी लेकिन
कल के फूलों की छुवन क्यों भूलूँ

तुझसे नाहक वफ़ा की आस करूँ
मैं मोहब्बत का चलन क्यों भूलूँ

बन के खुशबू तू बस गया दिल में
अपने अन्दर का चमन क्यों भूलूँ

कितनी शिद्दत से मिला था मुझसे
मैं वो रूहों का मिलन क्यों भूलूँ

ख़ाक होना है मुकद्दर मेरा
तूने बक्शी है जलन क्यों भूलूँ

आनंद द्विवेदी २०-११-२०११

सोमवार, 21 नवंबर 2011

एक रूहानी शाम ... औलिया के दरबार में !

कल २०-११-२०११ रविवार की शाम 
हज़रत निजामुद्दीन औलिया कि दरगाह पर अपने औलिया के साथ बीती एक शाम ..... कभी न भुलाने वाला अनुभव ..पिछले ६ महीने से जाने की सोंच रहा था .... भला हो राकस्टार फिल्म का...जिसने ये आग एकदम से भड़का दी मेरे अन्दर ..वैसे भी राकस्टार के नायक जार्डन की आत्मा मेरे अन्दर घुस गयी है जब से मैंने उसे देखा है ....जैसे किसी ने मेरे प्रेम को सेल्युलाइड पर उतार दिया हो ....
खैर अपरान्ह ३.३० पर मैं उस गली  के मुहाने पर था जहाँ औलिया का दरबार है,  बाइक और हेलमेट को गली के मुहाने पर ही एक माता जी के सुपुर्द करके मैं आगे बढा ...अन्दर जाकर दरगाह से काफी पहले ही एक जगह कदम ठिठक गये देखा तो मिर्ज़ा ग़ालिब की मज़ार का दरवाजा था बाएं हाथ पर ! मुझे ठिठकता देख एक एक बन्दे ने पुकारा आइये साहब जूते यहीं उतर दीजिये ...कोई पैसा नही पड़ेगा ...मैंने जूते वहीँ उतारे ...उसने पूछा पहली बार आये हो मैंने कहाँ हाँ ..उसने तफसील से समझाया कैसे जाना है क्या-क्या करना है कैसे चादरें चढ़ानी हैं (चादरें शब्द इस लिए की वहां अन्दर जाकर मुख्य अहाते में दो मजारें हैं एक अमीर खुसरो साहब की और दूसरी को बड़े दरबार के नाम से जाना  जाता है वो औलिया हुजुर की है )! नियाज़ (चादर और फूल बेचने वाले का नाम जो बाद में पता चला लौटकर ) ने पूछा की पूरी मज़ार की चादर चढ़ानी है या छोटी ..मैंने कहा नही पूरी मज़ार की ...और मैं तब तक शायद खुद को भूल चुका था ... मेरा चेहरा भावों में डूबा हुआ था मेरी आँखों से...बेसबब पानी बह रहा था |  पैसे का मोलभाव करने का मेरा मन जरा भी नही था ...नियाज़ ने मुझसे पुछा तो मैंने कह तो तुम्हें ठीक लगे वो दे दो , उसने दो चादरें निकाली..और इत्र की दो शीशियाँ निकल कर बोला की आप यहीं से इन पर इत्र  डाल लो वहां भीड़ में शायद आपको इतना समय न मिले हाँ गुलाब जल आपको मज़ार पर ही छिड़कना है इसलिए  इसको लेकर जाओ आप...खैर हम नियाज़ भाई का शुक्रिया अदा करके आगे बढे तो उसने मुझे रोक कर कहा .... भाई आप जो भी हैं जहाँ से भी आये हैं ...पर मेरा मन करता है की मैं सच्चे मन से आपके लिए दुआ करूं ..जाइये आपकी मुराद जरूर पूरी होगी ...अब मैं उसको कैसे कहता की मेरी मुराद वो ही  हैं जिनका मुरादी बनके मैं आया हूँ   !
अन्दर अमीर खुसरो साहब की मजार पर चादर चढ़ा  कर हम बड़े दरबार की ओर बढे ... मेरे सामने थे  मेरे औलिया और उनके सामने था मैं और मेरी रूह !




कहाँ होश था खुद का मुझे ..चादर चढ़ाई  इबादत किया चूम लिया और बाहर आगया...... शायद किसी ने मुझे सहारा  देकर बाहर निकाला था ....! बाहर कौव्वाली का दौर चल रहा था कौव्वाल कमाल साहब (नाम बाद में पता चला ) ने एक कौव्वाली शुरू की मैं उनकी बगल में बैठ गया था ..लगा की वो कौवाली नही मेरी आवाज मेरी गुज़ारिश मेरा दर्द गा रहे हैं औलिया  के सामने ...
पहला शेर उन्होंने गाया ....
दिल मैंने अपने यार को नजराना कर दिया
उस यार की अदाओं ने दीवाना कर दिया |
...मेरी तालियाँ शुरू हो चुकी थी आँख बंद थी ...मैं झूम रहा था .एक अलाप छोटा सा और फिर अगली  बात ...
दिन रात पी रहा हूँ तेरी नज़रों के जाम से
साक़ी ने मेरे नाम ये मैखाना कर दिया ...
.....वाह ! सच में मुक्त कर दिया मुझे उसने सारी कायनात करके मेरे नाम.... उसे शायद पता था की मेरी प्यास एक दो जाम से जाने वाली नही है ....कमाल साहब ने कलाम को आगे बढाया ...
मैं जल रहा हूँ , उसका मुझे कोई ग़म नही
तू शम्मा बन गया मुझे परवाना कर दिया
.... इस बार मेरे मुस्कराने की बारी थी ..लगा जैसे कोई मुझसे कुछ कह रहा हो या कुछ कहना चाह रहा हो .... मैं होठों ही होठों में बुदबुदाया जो तेरी रज़ा !...आगे का शेर
गर मौत भी मांगी तो मुझे मौत न आयी
गर जिंदगानी मांगी तो बहाना कर दिया 
..... हंस पड़ा मैं उसके खेल को उसके इशारे को सोंचकर .... मुझे कह दिया था उन्होंने जो कहना था ...| और फिर अंतिम शेर ...
लुत्फो करम  से  ऐसे  नवाजा हुजूर ने
हुश्न-ओ-लिबास तक मुझे शाहाना कर दिया
...हाँ सच ही तो है ...ये नियामत वो सब पर कहाँ बरसाते हैं की जिस से लिबास (जिस्म) से लेकर हुश्न (रूह) तक शाही हो जाए ...ये दौलत तो वो किसी  किसी को बक्सते हैं |
अजान का समय हो गाया था कौवाल साहब ने भी हारमोनियम बंद  ही कर दी जबकि मैं अभी भी प्यासा था ... ..जब मैंने उनसे गुजारिश की कि मुझे ये कलाम लिखना है, ... याद हो गया है मगर कहीं कहीं भूल रहा हूँ तो वो जरा गुस्से से बोले ...ये मेरे महबूब का कलाम है  ये किसी और  के लिए नही है ..तो मैंने कहा कि वो मेरा भी महबूब है  मेरी इस बात में नजाने मेरे चेहरे पर क्या देखा उन्होंने कि बोल चल इधर आ और अलग ले जाकर उन्होंने मुझे इसे लिखवाया फिर |



चौखट चूम कर औलिया की मैं  बाहर आगया   फकीरों को खाना खिला कर ..एक बार फिर नियाज़ भाई के पास ..नियाज़ भाई मुझे फिर ग़ालिब कि मज़ार दिखाने ले गये( वो वाकया फिर कभी ) ...हम दोनों ने एक चाय के दो हिस्से कर के पिए ...मैंने नियाज़ भाई को  गले लगाया और उनसे विदा मांगी ..चलते चलते उन्होंने कहा ...कि साहब इस आने वाले वृहस्पतिवार के बाद जो अगला वृहस्पतिवार है ...आप जरूर आइयेगा तब नौचंदी  मेला भी शुरू हो जाएगा तब और दिन पहला मुहर्रम भी है मैं आपको लेकर साथ चलूँगा अन्दर वहां मैं सबसे मिलवाऊंगा आपको ..आप जैसा आदमी कभी कभार ही आता है यहाँ  मैं बहुत खुश हूँ आपसे मिलकर ....
रास्ते भर मैं सोंचता रहा मुझ जैसा आदमी ... किस काम  का होता है .....या मेरे औलिया सुकून बक्स मेरी रूह को !!

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

मैं प्रस्तुत हूँ !



एक दिन
जब मैं आसमान पर
चाँद को
चूम रहा था |
एक जन्मजात चोर
मेरे सारे सपने
चुरा रहा था
यहाँ
धरती पर |
वो सपने
जो किसी और के
काम के नहीं हैं
थोड़ी देर खेलेगा वो
उनसे
और फिर फेंक देगा
तोड़ मरोड़  कर |

अब सोंचता हूँ
कुछ तो वजह होगी ही
जब  तूने
इस नायाब दर्द के लिए
मुझे चुना है |
तो फिर कर इन्तेहाँ
सितम की अपने
क्योंकि जानता हूँ मैं
यह तो
आगाज़ है अभी |

अय 'छलिया' !
मेरे पास
और कुछ था ही नहीं
सो मैंने भी
तुझे दांव पर लगा दिया
अब
इस खेल में
हारेगा भी तू
और जीतेगा भी तू ही
आ जा ....
मैं प्रस्तुत हूँ !!

- आनंद द्विवेदी १७/११/२०११

रविवार, 13 नवंबर 2011

मेरा पथ सुंदर करने को ..



मेरा पथ सुंदर करने को
कितने कष्ट उठाये तुमने
मेरे मन का तम हरने को
कितने दीप जलाये तुमने

तुमसा प्रेम निभाने वाला
इस धरती पर कौन मिलेगा
तुम सा सुंदर पुष्प दूसरा
अब उपवन में कहाँ खिलेगा
जब खुशबू का ज्ञान नहीं था
तब भी पल महकाए तुमने ,
मेरे मन का तम हरने को, कितने दीप जलाये तुमने |

'मैं हूँ' 'मेरा है' जब तक था
तब तक तुमको समझ न पाया
फिर भी कदम कदम पर हमदम 
तुमने सच  का बोध कराया ,
गीता के श्लोक हो गए
जो जो गीत सुनाये तुमने |
मेरे मन का तम हरने को , कितने दीप जलाये तुमने |

तेरी राहों में ये जीवन
अपने आप समर्पित प्रियतम
अंतर में अद्वैत प्रकाशित
अब तो न मैं हूँ और न तुम
प्रेम शांति और अहोभाव के
मुझमे बीज जगाये  तुमने |
मेरा पथ सुंदर करने को, कितने कष्ट उठाये तुमने |
मेरे मन का तम हरने को, कितने दीप जलाये तुमने ||

 - आनंद द्विवेदी - १३/११/२०११.

सोमवार, 7 नवंबर 2011

तेरे बाद ......



एक और पल

तुम कहते थे ना
जी लो
इन पलों को
ये चले गए तो
लौटकर नहीं आयेंगे....
अहं में डूबा हुआ
मैं
नहीं समझा पाया
तब
तुम्हारी बात |
सुनो !
क्या तुम्हारे पास
एक और पल है ?
वैसा ही !

कुछ भी नही है

कल तक
मेरे पास
समय नही था
किसी काम के लिए
आज
मेरे पास
कोई काम नही है
करने को |
बस एक
तू ही तो नही है
मगर
ऐसा क्यों लगता है कि
कुछ भी नही है
दुनिया में
मेरे लिए
अब !!

आनंद द्विवेदी ०७/११/२०११

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

हर सांस तेरा नाम लिये जा रहा हूँ मैं




हर सांस तेरा नाम लिए जा रहा हूँ मैं
सारे हसींन ख्वाब जिए जा रहा हूँ मैं !!


तू मुझको संभाले ना संभाले तेरी मर्ज़ी ,
इतना तो होश है की पिए जा रहा हूँ मैं !

मूरत पे हक़ किसी का, पर 'श्याम' तो मेरा,
कुछ इस तरह से प्यार किये जा रहा हूँ मैं !

कातिल ने इस दफा भी मेरी जान बक्स दी ,
अब इस अदा पे जान दिए जा रहा हूँ मैं !


मैं जाऊं जहाँ भी, वो जगह तेरा दर लगे ,
इतना तो तुझे साथ लिए जा रहा हूँ मैं !

दिल में तेरे रहूँ ,भला इसकी भी फिक्र क्या
'आनंद' तेरे नाम किये जा रहा हूँ मैं   !



आनंद द्विवेदी -  ०१/११/२०११

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

नि:सीम..



तोड़ कर 
दुनिया भर की 
सीमाओं को ,
सही गलत के 
विश्लेषण से परे ,
घटित हुआ था 
हमारा प्रेम ..
जिया है 
हर पल जिसे 
होते हुए हमने 
किसी मंदिर में ..
फिर
एक दिन अचानक....

क्यों बांधना चाहा था मैंने,
तुमको ,
सीमाओं में !
क्यूँ सोच न पाया मैं 
कि 
नहीं है प्रेम 
मंदिर की 
सीमाओं तक ही !!!

सुन ..!
ओ मेरे
प्रेम गगन के पंछी,
ले  कर
मेरी साँसों से
अपने प्यार के
संदल की खुशबू ,
दे विस्तार 
अपनी  
सहज ,
स्वाभाविक 
उड़ान को...
हो जाये सुरभित
जिससे
ये धरती
क्या ,
आकाश भी !!

आनंद द्विवेदी २५/१०/२०११

शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

तुम..!



तुम गुजरते हो जिन राहों से
जल उठते हैं दीप
स्वतः ही ,
मुरझाये पौधों में भी
चहक उठता है
जीवन ..
हवाओं की
सरसराहट में भी
गूँज उठता है
एक अनोखा
संगीत ,
देखो न !!!
कैसे
सारी प्रकृति
तुम्हारे बहाने से
जाहिर करती है
खुशियाँ
अपनी !


महसूस करके
तुम्हे
जड़ भी
चेतन हो जाए..
छूने से तुम्हारे
इंसान भी
देवता हो जाए...
एक नजर
प्यार से देख लो तुम
तो
मरुस्थल में भी
बसंत खिल जाए..
तुम्हे
पाने वाला
पूरी दुनिया का
अभीष्ट बन जाए !

किसी ने
देखा नहीं
भगवान को,
सुना ही था कि
'प्रेम में ही भगवान मिलते है '
आज पहली बार
ऐसा लग रहा है
कि
कहने वाले
सच ही कहते हैं !!

आनंद द्विवेदी २५/१०/२०११

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

हरसिंगार की महक !......



यहीं
इसी
हर सिंगार के नीचे
जब धवल पुष्प 
एक एक कर झर रहे थे
हमारे तन पर .
हमारे चारों तरफ ,
तुम
मेरे सीने पर
अपनी उँगलियों से
लिख रही थी
मेरा ही नाम
यूँ ही !

प्रकृति
एकदम मौन थी
जैसे अभी शब्द की
उत्पत्ति ही नही हुई हो
समय भी
तनिक सा रुक गया था
मानो वो भी
साक्षी होना चाह रहा था
इस परमात्मिक प्रेम का !

चाँद
टकटकी लगाए
देख रहा था
हमारे
मोद को
मिलन को
प्रेम को ,
हमारी डूबन को
हमारी समाधि को !

सहसा
चाँद ने
शुभ्र चांदनी की
एक चादर
डाल दिया हमारे ऊपर
और
मुस्कराकर
अपनी मंजिल को चल पड़ा !

धीरे धीरे ...
हम ढक गये
हरसिंगार  के श्वेत पुष्पों से 
देखो न
हमारी सांसें
अभी भी
वैसी ही
महक रही हैं  !!


  -आनंद द्विवेदी २८/१०/२०११ 

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

प्रेम ..!



क्या कहूँ या लिखूं ..
अब तक
जो जाना था
कोई रूचि नहीं
अब उसमे ...
जो बरस रहा है
'इस पल' में
पहले उसे जी लूं
उसे पी लूं
लिखता रहूँगा ग्रन्थ
बाद में
हाँ
अगर एक शब्द में
लिखी कविता
समझ सकते हो
तो लो
लिख देता हूँ
प्रेम !!

आनंद द्विवेदी ....२४/१०/२०११

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

फिर वही दिन आ गये, फिर गुनगुनाना आ गया




फिर वही दिन आ गये, फिर गुनगुनाना आ गया,
जाते जाते लौटकर , मौसम सुहाना आ गया   |

फिर किसी रुखसार की सुर्खी हवा में घुल गयी,
फिर मुझे तनहाइयों में मुस्कराना आ गया   |

सबकी नजरों से छुपाकर, उसने देखा फिर मुझे,
फिर मेरे मदहोश होने का ज़माना आ गया    |

शोखियों की बात हो या सादगी की बात हो,
हर अदा से अब उसे बिजली गिराना आ गया |

अब नही पढ़ पाइयेगा, उसकी रंगत देखकर,
उस हसीं चेहरे को भी , बातें छुपाना आगया |

मेरे दिलवर से मुझे भी , कुछ हुनर ऐसा मिला,
आग के दरिया से मुझको, पार जाना आगया |

जिंदगी 'आनंद' की, अब भी वही है दोस्तों,
हाँ मगर उसको, उसे जन्नत बनाना आ गया |

- आनंद द्विवेदी   ०६/१०/२०११

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

इतना कुछ दे डाला है.....






राज छुपाये दुनिया भर के, खाक जहाँ की छान रहे
कितने ज्ञानी मिले राह में, हम फिर भी नादान रहे

सारे जीवन भर के शिकवे, अपने साथ ले गये वो
मेरे घर भी ख्वाब सुहाने, दो दिन के मेहमान रहे

आखिर उनका भी तो दिल है, दिल के कुछ रिश्ते होंगे
क्यों ये बात न समझी हमने, बे मतलब हलकान रहे

अपने से ही सारी दुनिया, बनती और बिगड़ती है
जिस ढंग की मेरी श्रद्धा थी, वैसे ही भगवान रहे

तू है प्राण और मैं काया, तू लौ है मैं बाती हूँ
ये रिश्ते बेमेल नही थे, भले न एक समान रहे

जाते जाते साथी तूने, इतना कुछ दे डाला है
साथ न रहकर भी सदियों तक, तू मेरी पहचान रहे

दुआ करो 'आनन्द' सीख ले, तौर तरीके जीने के
फिर चाहे तेरी महफ़िल हो, या दुनिया वीरान रहे


   -आनन्द द्विवेदी, ०२/१०/२०११

शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

मुझे रस्सी पे चलने का तजुर्बा तो नहीं, लेकिन



जरा फुर्सत से बैठा हूँ, नज़ारों पास मत आओ,
मैं अपने आप में खुश हूँ, बहारों पास मत आओ |

सितमगर ने जो करना था किया, मझधार में लाकर,
जरा  किस्मत भी अजमा लूं, किनारों पास मत आओ |

मुझे  रस्सी पे चलने का   तजुर्बा तो नहीं, लेकिन
मैं फिर भी पार कर लूँगा, सहारों पास मत आओ  |

मेरी खामोशियाँ बोलेंगी, और वो बात सुन लेगा,
जो कहना है मैं कह दूंगा, इशारों पास मत आओ |

कई सदियों तलक मैंने भी, काटे चाँद के चक्कर ,
बड़ी मुश्किल से ठहरा हूँ, सितारों पास मत आओ |

महज़ 'आनंद' की खातिर , गंवाओ मत सुकूँ अपना,
न चलना साथ हो मुमकिन, तो यारों पास मत आओ |


  -आनंद द्विवेदी ३०/०९/२०११


शनिवार, 24 सितंबर 2011

चिराग़ बनके, कोई राह दिखाता है मुझे




राह अनजान है,  तूफां भी डराता है मुझे,
मैं तो गिर जाऊं तेरा प्यार बचाता है मुझे |

घेर लेते हैं अँधेरे, निगाह को जब भी ,
चिराग़ बनके, कोई राह दिखाता है मुझे |

जब भी होता है गिला मुझको, मुकद्दर से मेरे,
दिल की दुनिया में कोई पास बुलाता है मुझे |

जिस तरफ देखूं, जहाँ जाऊं, तेरा ही चेहरा,
हाय रे 'इश्क', अजब रंग दिखाता है मुझे  |

जिक्र जब तेरा उठे , कैसे सम्भालूँ खुद को,
दोस्त कहते हैं कि, तू नाच नचाता है मुझे |

प्यार करता है मुझे बेपनाह वो जालिम,
दिन में दो चार दफे रोज़ रुलाता है मुझे  |

वो न मिलता तो भला कौन समझता मुझको,
प्यार उसका ही तो 'आनंद'  बनाता है मुझे  ||

  -आनंद द्विवेदी २४-०९-२०११  

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

समंदर उबल ना जाये कहीं ...







फिर एक शाम उदासी में ढल न जाये कहीं |
आ भी जाओ ये हसीं वक्त टल न जाए कहीं

रोक रक्खा है भड़कने से दिल के शोलों को
मेरे दिल में जो बसा है वो, जल न जाये कहीं |

नज़र में ख्वाब पले हैं, औ नींद गायब है ,
आँखों-आँखों तमाम शब, निकल न जाये कहीं |

उन्हें ये जिद कि वो मौजों के साथ खेलेंगे,
मुझे ये डर कि समंदर, उबल न जाये कहीं |

आपकी बज़्म में आते हुए डर जाता हूँ,
हमारे प्यार का किस्सा उछल न जाये कहीं |

जानेजां शोखियाँ नज़रों से लुटाओ ऐसी,
रिंद का रिंद रहे वो संभल न जाये कहीं |

रुखसती के वो सभी पल नज़र में कौंध गये,
अबके बिछुड़े तो मेरा दम निकल न जाए कहीं |

रूह से मिल गया ' आनंद ' जब से ऐ यारों
लोग कहते हैं ये इन्सां बदल न जाये कहीं |

- आनंद द्विवेदी १३-०८-२०११

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

रस्म-ए-उल्फत निभा के देख लिया










रस्म-ए-उल्फत निभा के देख लिया
हमने भी   दिल लगा के देख लिया

सुनते आये थे आग का दरिया
खुद जले, दिल जला के देख लिया

उनकी दुनिया में उनकी महफ़िल में
एक दिन,   हमने जाके देख लिया

दर्द भी,  कम हसीँ  नही  होते
बे-सबब मुस्करा के देख लिया

उनका हर जुल्म, प्यार होता है
चोट पर चोट खा के देख लिया

इश्क ही अब है बंदगी अपनी
उनको यजदां बना के देख लिया

उनको 'आनंद' ही नही आया
हमने खुद को मिटा के देख लिया

यजदां = खुदा

आनंद द्विवेदी ७/०८/२०११

बुधवार, 10 अगस्त 2011

उनसे भी मेरा प्यार छुपाया ना जायेगा



मुझसे तो खैर होश में आया ना जायेगा
उनसे भी मेरा प्यार छुपाया ना जायेगा

चेहरा मेरा किताब है पढ़ लेना इसे तुम
मुझसे यूँ हाले दिल तो बताया न जाएगा

तुम आ गये जो याद तो जलते ही रहेंगे
मुझसे कोई चिराग बुझाया ना जाएगा

इस बार गर मिलो तो जरा एहतियात से
अब जख्म नया मुझसे भी खाया न जाएगा

सपना नहीं किसी का इक बूँद अश्क हूँ मैं
नज़रों से गिर गया तो उठाया न जाएगा

खामोश हसरतें हैं, कि तू कह दे इक दफा
गैरों को कभी बीच में लाया न जाएगा

जालिम सितम किये जा, पर ये भी ख्याल रख़
'आनंद' मिट गया तो बनाया न जाएगा

  -आनंद द्विवेदी ४/०८/२०११

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

कितनी मुश्किल से मिला है यार का कूचा मुझे



यार की महफ़िल है यारों राज़ की बातें करो
ऐसे मौकों पर निगाहे नाज़ की बातें करो

कितनी मुश्किल से मिला है यार का कूचा मुझे
भूल कर अंजाम, बस आगाज़ की बातें करों

मुझको आदत पड़ गयी है आसमां की ,चाँद की
पंख की बातें करो , परवाज़ की बातें करो

डूब जाओ इश्क में तुम, भूल कर दुनिया के गम
हुस्न की बातें करो , अंदाज़ की बातें करों

ज़िन्दगी को गीत जैसा , गुनगुनाना हो अगर
साज़-ए-दिल पर बज उठी आवाज़ की बातें करो

आज कल 'आनंद' को कुछ तो हुआ है दोस्तों
आँख भर आती है गर हमराज़ की बातें करो

   -आनंद द्विवेदी ०३-०८-२०११

रविवार, 7 अगस्त 2011

मई की क्रांति


तुम ..

तुम
कैसा अहसास हो
जहाँ मन ऐसे लगता है जैसे
समाधि
या फिर कोई नशा
जिसे पीकर कभी भी
होश में आने का मन न हो ..
या फिर कोई जहर
जिसे पीकर हमेशा के लिए
मेरी मौत हो गई है
खुद के अन्दर
और तुम बन बैठे हो
अहिस्ता से
मेरा वजूद !

मैं 

मैं
वो हूँ ही नही
जो मुझे सभी
समझते हैं
जानते हैं
मैं केवल वो हूँ
जो तुम समझती हो
जानती हो
मानती हो
वही हूँ मैं
वही हो गया हूँ  !!


मई की क्रांति 


मेरे लिए
उसका प्यार
उस
क्रांति से भी ज्यादा है...
सत्ता और व्यवस्था की छोड़ो
मेरा तो
जीन बदल गया है
अब
कई जन्मों तक
मैं
केवल प्रेम को ही
जन्म दूंगा ||

समझदार !

बड़ी जतन से
बर्षों में
तैयार होता है
एक
समझदार आदमी !
अन्दर की कोशिकाओं तक
निर्माण होता है 'मैं' का 'अहम्' का
कहना आसान है
मिटाना कठिन ....
लगभग आत्महत्या जैसा
इसीलिये
समझदार आदमी
हमेशा दूर भागते हैं
प्रेम से ||

प्रेम

गली गली में
उग आये है
उपदेशक !
चरणबद्ध तरीके से
सिखाया जाएगा
त्रुटिहीन  प्रेम ||


शबरी की कथा  !

कह दो
अंतिम क्षण में
साथ  रहने के लिए
या फिर मैं
तुम्हारे साथ के क्षण को ही
अंतिम बना लूं
कानों के ऊपर के
सफ़ेद बाल
सारे शरीर में फ़ैल रहे हैं
ऐसे में  मुझे
'शबरी' की कथा
बहुत याद आती है  !!

छोटे लोग !

कितनी
रंगीन महफ़िल थी यार !
शायरी और शबाब का दौर..
मगर इसमें भी
'उस' साले ने
आलू, प्याज
रसोई गैस के बढ़े दाम ....घुसेड़ दिए
उफ्फ्फ
ये छोटे लोग न
कभी बड़ा
सोंच ही नही सकते ||

आनन्द द्विवेदी १४-०७-२०११

मेरा सच !


जैसे पानी का एक बुलबुला  ....
सपना तो
बिलकुल भी नहीं था
था तो हकीकत ही ...
मगर
इन  कमबख्त बुलबुलों की
उम्र ही कितनी होती है
कुछ तो आवाज़  भी नहीं करते ....
मेरा प्यार....
खामोश  बुलबुला  तो नहीं था न ?

_______________________


लगता ही नही
मैंने
जन्नत नही देखी
याकि मैं
इस धरती का
रहने वाला हूँ,
तुमको पाकर
लगता ही नही
कि
मुझमे कुछ कमी है  !



आनन्द द्विवेदी १३-१४/०७/२०११

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

उसने सब लाजवाब भेजा है |





उसने ख़त का जबाब भेजा है ,
हाय क्या इंकलाब भेजा है |

प्यार में डूबी ग़ज़ल भेजी है 
एक प्यारा गुलाब भेजा है !

नींद आँखों से लूटकर उसने 
कितना मदहोश ख्वाब भेजा है |

दिन को, खुशबू चमन की भेजी है 
रात को, माहताब भेजा है  |

राह चलते हिना महकती है 
उसने ऐसा शबाब भेजा है |

अपने 'आनंद' के लिए यारों 
उसने सब लाज़बाब  भेजा है |

आनंद द्विवेदी ०५/०७/२०११ 

बुधवार, 6 जुलाई 2011

बोलो कुछ तो बोलो सजनी.....



मैं आज जगत का स्वामी हूँ
तुम बाहुपाश में, मेरे हो,
सहसा इस प्रकृति प्रियतमा ने
ज्यों सुन्दर चित्र उकेरें हों ,
मैं तुमको क्या क्या भेंट करूं
क्षण लोगी या जीवन लोगी
                   बोलो कुछ तो बोलो सजनी
                   दिल लोगी या धड़कन लोगी

जो स्वप्नों से हो प्यार तुम्हें
तो नभ ले लो, उडगन ले लो 
हो स्वप्नों का विस्तार प्रिये
तुम मन ले लो, मोहन ले लो
मैं तुमको क्या क्या भेंट करूं
दृग लोगी या चितवन लोगी
                बोलो कुछ तो बोलो सजनी
                दिल लोगी या धड़कन लोगी

तुम शुभ्र चांदनी, चंदा की
खुशबू जैसे, चन्दन वन की
तुम दशों दिशाओं की मलिका
इच्छित हो मेरे जीवन की
मैं तुमको क्या क्या भेंट करूं
मधु लोगी, या मधुवन लोगी
                बोलो कुछ तो बोलो सजनी
                दिल लोगी या धड़कन लोगी ||

   -आनंद द्विवेदी ३०-०६-२०११ 

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

मेरी बस्ती से अंधेरों.. भागो !



खामखाँ मुझको सताने आये,
फिर से कुछ ख्वाब सुहाने आये |

मेरी बस्ती से अंधेरों.. भागो,
वो नई शम्मा जलाने आये  |

जिनको सदियाँ लगी भुलाने में,
याद वो किस्से पुराने आये  |

वो जरा रूठ क्या गया मुझसे,
गैर फिर उसको मनाने आये |

मेरी दीवानगी..सुनी होगी,
लोग अफसोश जताने आये !

मैं तो जूते पहन के सोता हूँ,
क्या पता कब वो बुलाने आये |

उसके हिस्से में जन्नतें आयीं ,
मेरे हिस्से में जमाने  आये   |

यारों 'आनंद' से मिलो तो कभी,
आजकल उसके जमाने आये  ||

   -आनंद द्विवेदी ३०-०६-२०११ 

गुरुवार, 30 जून 2011

तुमने फिर से वहीं मारा है ज़माने वालों







हर तरीका मेरा  न्यारा है,  ज़माने वालों ,
आज कल वक़्त हमारा है, ज़माने वालों !

जख्म रूहों के भरे जायेंगे, कैसे मुझसे ,
तुमने फिर से वहीं मारा है, ज़माने वालों !

दो घड़ी चैन से तुमने जिसे जीने न दिया,
किसी की आँख का तारा है, ज़माने वालों !

बेवजह ही नहीं मैं बांटता, जन्नत के पते,
मैंने कुछ वक़्त गुज़ारा है, ज़माने वालों  !

कौन कम्बख्त भला होश में रह पायेगा ?
जिस तरह उसने निहारा है, ज़माने वालों !

आज 'आनंद' की दीवानगी से जलते हो ,
तुमने ही उसको बिगाड़ा है, ज़माने वालों !

       आनंद द्विवेदी १६-०५-२०११

शनिवार, 11 जून 2011

प्यार छुपाना मुश्किल है...





सांसों पर पहरे बैठे हैं, कुछ कह पाना मुश्किल है,
दर्द छुपाना आसाँ था पर, प्यार छुपाना मुश्किल है!

नदी किनारे जिस पत्थर पर पहरों बैठे थे हम-तुम,
खुद को भूल गया हूँ लेकिन, उसे भुलाना मुश्किल है!

पीने वाले आँखों के मयखाने से,  पी लेते हैं,
कहने वाले कहते घूमें लाख, जमाना मुश्किल है !

ये उसकी साजिश है कोई, या उसका दीवानापन
मुझसे ही कहता है, तुमसा आशिक़ पाना मुश्किल है!

तुम ही कुछ समझाओ यारों, मेरे इस नादाँ दिल को,
फिर उसको पाने को मचला, जिसको पाना मुश्किल  है !

मेरे दिलबर की दुनिया भी खूब तिलस्मी दुनिया है
आना तो आसाँ है इसमें, वापस जाना मुश्किल है !

जाने उसकी आँखों में क्या बात क़यामत वाली है 
जिससे नज़रें मिल जाएँ, उसका बच पाना मुश्किल है !

मिले कहीं 'आनंद' तुम्हें तो , सुन लेना बातें उसकी ,
सचमुच दीवाना  है वो, उसको समझाना मुश्किल है   !!

    --आनंद द्विवेदी ११-०६-२०११ 

गुरुवार, 2 जून 2011

पता ही नहीं चला.... !


कब उनसे हुई बात, पता ही नहीं चला 
कब बदली क़ायनात, पता ही नहीं चला !

यूँ मयकशी से मेरा, कोई वास्ता न था 
कब हो गयी शुरुआत, पता ही नहीं चला !

उस एक मुलाकात ने क्या क्या बदल दिया 
'वो' बन गये हयात , पता ही नहीं चला ! 

दो चार घड़ी बाहें, दो चार घड़ी सपने 
कब  बीत गयी रात, पता ही नहीं चला !

मीठी सी चुभन वाली, हल्की सी कसक वाली 
कब हो गयी बरसात , पता ही नहीं चला !

हम कब से आशिकी को, बस दर्द समझते थे 
कब बदले ख़यालात , पता ही नहीं चला !

'आनंद' को मिलना था, इक रोज़ बहारों से 
कब बन गए हालात,  पता ही नहीं चला  !

आनंद द्विवेदी ०१/०६/२०११


बुधवार, 1 जून 2011

दिल चीज़ क्या है .....


मेरा दिल न...
मुझे
अपनी जान से
ज्यादा प्यारा है
पूछो क्यों ?


इसे
सब पता है
मेरे बारे में
मेरा
हर राज
जानता है यह
इसे ये भी पता है
कि 
मैं खून भेजने भर से
जिन्दा नहीं रह पाउँगा
तभी तो
ये पम्प करता है
सपने ,
एहसास
सुरूर,
और कई बार तो
आग भी
मेरे अन्दर !
मेरी नसों के
अंतिम सिरे तक
मेरी हर रग में
मेरा प्यारा दिल..!
खून 
पम्प करने का काम
तो
मुर्दा दिल
भी कर ही लेते  हैं
 या 
दिल की  जगह 
कोई मशीन भी 

मगर मेरा दिल
मुर्दा नहीं ..
महसूस करता  है 
मेरी मदहोशी को 
जानता है 
किसको देखकर 
 इसे उछल जाना है बल्लियों 
और कब
ठहर जाना है
बिलकुल ही 
किसी एक मुस्कान पर  
पल भर के लिए ....
इसे तो ये भी पता है
कि
किसके न मिलने पर
इसे धड़कने से
मना कर देना है..
कब महफ़िल सजानी है
कब गुनगुनाना  है
कब सपने देखने हैं
और
कब
टूट जाना है
चुपचाप
बिना
कोई आवाज़ किये....!

आनंद द्विवेदी २५-०५-२०११  


सोमवार, 30 मई 2011

वापसी -प्रतीक्षा के बाद....



वेटिंग रूम से ...कविता .... की अगली और अंतिम कड़ी 

याद आ रहा है मुझे
गुज़रते हुए इस
अनिश्चितकालीन प्रतीक्षा से
कहा था कभी
तुमने
कि बदलती है 
अनिश्चित प्रतीक्षा
जब 
अंतहीन प्रतीक्षा में
तब 
ऊब कर 
लौटता है 
मन
वापस  
अपने घर की ओर ...

गूँज गए हैं 
तुम्हारे शब्द 
अंतर्मन में मेरे-
"मुड़ो अपनी ओर.. 
डूबो  खुद में
मैं वहीँ हूँ
तुम्हारे भीतर
मत ढूंढो मुझे बाहर
बस खुद से मिलो ..
मिलो तो एक बार  !!!"

हाँ !!
यही कहा था तुमने...
और फिर मैंने भी
स्थगित कर दी
आगे की यात्रा,
अनिश्चित का इंतज़ार,
लौट पड़ा हूँ घर को 
तुम्हारे शब्दों में जादू है
या मेरे विश्वास में  ?
 कह नहीं सकता 
किन्तु ...
डूबने लगा हूँ मैं
खुद में..
करने लगा हूँ 
तैयारी
एक महायात्रा की...
आ रहा हूँ
तुम्हारे पास ,
इसी विश्वास के साथ 
कि
दिशा सही है अब
पाने को 
मंज़िल अपनी ....

आनंद द्विवेदी 
२७/०५/२०११

बुधवार, 25 मई 2011

छू लो , पगलाई उमंग को !



आने दो , हर सहज रंग को !
छू लो ,  पगलाई उमंग को  !

शाम नशीली रात चम्पई 
दिवस सुहाने सुबह सुरमई 
पिया मिलन की आस जगी है
फिर अधरों पर प्यास जगी है
मूक शब्द क्या कह पाएंगे 
महा मिलन के मुखर ढंग को 
छू लो ,  पगलाई उमंग को  !

तन में वृन्दावन आने दो 
मन को मधुवन हो जाने दो 
फिर से मनिहारी मोहन को 
बरसाने तक आ जाने दो 
तन वीणा के तार बन गया 
बजने दो अविरल मृदंग  को 
छू लो, पगलाई उमंग को  !

मैं पूजा की थाल सजाये 
कब से बैठा आस लगाये 
सदियों बीत गए हों जैसे 
कान्हा को नवनीत चुराए 
सुन लो फिर वंसी का जादू
खिल जाने दो अंग-अंग को 
आने दो हर सहज रंग को !
छू लो  पगलाई उमंग को  !!

  आनंद द्विवेदी १५-०५-२०११

सोमवार, 23 मई 2011

मोह न मोहन ....!



रात में ३.४५  बजे के आसपास एक गाड़ी ब्रजमंडल से होकर गुजरती है मथुरा आने वाला है ...देह साधती है ब्रज भूमि को और मन साधता है उस सांवरे की यादों को...जिसने निमिष मात्र में ही जीवन बदल दिया, भर दिया मेरे अणु अणु को प्रकाश से .....!
राधा माधव  ... माधव राधाकिसी भी नाम से बुला लो दोनों चितचोर दोनों रसिया क्यों की दोनों दो नहीं एक ही हैं  ....




तन राधा के रंग रंगा, मन वृन्दावन धाम !
एक रात मैं क्या रुका, बरसाना के ग्राम  !!

साँस साँस चन्दन हुई, धड़कन हुई अधीर !
जब से मन में बस गयी, बृज बनिता की पीर !!

एक बूँद ने कर दिया, जीवन में यह फर्क  !
झूठे सब लगने लगे, उद्धव जी के तर्क  !!

व्याकुलता पूजा  हुई, श्रद्धा हो गयी प्यास !
जाने जीवन को मिला, ये कैसा मधुमास  !!

धड़कन यमुना तट हुयी, दिल कदम्ब की डार !
सारे तन में हो गया,    कान्हा का विस्तार  !!



सोमवार, 16 मई 2011

एक बार होना चाहिए ...



जिंदगी में कम से कम एक बार होना चाहिए
मेरी ख्वाहिश है सभी को प्यार होना चाहिए !

इश्क में और जंग में हर दांव जायज़ है, मगर
आदमी पर सामने से,   वार होना चाहिए   !

नाम भी मजनूँ का गाली बन गया इस दौर में
बोलो,     कितना और बंटाधार होना चाहिए  !

लैस है, 'वृषभान की बेटी' नयी तकनीक से ,
'सांवरे' का भी नया अवतार होना चाहिए  !

हाय क्या मासूमियत, क्या क़त्ल करने का हुनर
आपका तो नाम ही ,   तलवार होना चाहिए  !

आँख भी जब बंद हो और वो तसव्वुर में न हो
ऐसे लम्हों पे तो बस,   धिक्कार होना चाहिए  !

जिंदगी तुझसे कभी कुछ,  और मांगूंगा नही
जिस तरह भी हो, विसाल-ए-यार  होना चाहिए

खासियत क्या इश्क की 'आनंद' से पूछो ज़रा
सच बता देगा मगर,  ऐतबार होना चाहिए  !!

           -आनंद द्विवेदी  १३-०५-२०११


मंगलवार, 10 मई 2011

मुझको वादे कुछ मिले थे मैंने पाया और कुछ



अपने स्कूलों  से तो, पढ़कर मैं आया और कुछ ,
जिंदगी जब भी मिली, उसने सिखाया और कुछ!

शख्त असमंजश में हूँ बच्चों को क्या तालीम दूँ  ,
साथ लेकर कुछ चला था, काम आया और कुछ !

आज फिर मायूस होकर, उसकी महफ़िल से उठा,
मुझको मेरी बेबसी ने ,   फिर रुलाया और कुछ  !

इसको भोलापन कहूं या, उसकी होशियारी कहूं?
मैंने पूछा और कुछ,   उसने बताया और कुछ  !

सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
मुझको वादे कुछ मिले थे,   मैंने पाया और कुछ !

आज तो  'आनंद' के,    नग्मों की रंगत और है ,
आज दिल उसका किसी ने फिर दुखाया और कुछ

              आनंद द्विवेदी  १०/०५/२०११

बुधवार, 4 मई 2011

मुस्कराओ तो दर्द होता है....!




गीत गाओ तो दर्द होता है,    गुनगुनाओ तो दर्द होता है,
ये भी क्या खूब दौर है जालिम, मुस्कराओ तो दर्द होता है!

ख्वाहिशों को बुला के लाया था, ख्वाब सारे जगा के आया था,
तेरी महफ़िल से भी सितम के सिवा, कुछ न पाओ तो दर्द होता है !
  
तेरी मनमानियां भी अपनी हैं, तेरी नादानियाँ भी अपनी हैं,
गैर के सामने यूँ अपनों से,    चोट खाओ तो दर्द होता है  !

उस सितमगर ने हाल पूछा है,  जिंदगी का मलाल पूछा है,
कुछ छुपाओ तो दर्द होता है, कुछ बताओ तो दर्द होता है  !

जिंदगी को हिसाब क्या दूंगा,  आईने को जबाब क्या दूंगा 
एक भी चोट ठीक से न लगे,    टूट जाओ तो दर्द होता है  !

ये सितम बार-बार मत करना, हो सके तो करार मत करना
पहले 'आनंद' लुटा दो सारा, फिर सताओ तो  दर्द  होता है


         --आनंद द्विवेदी  ४-०५-२०११

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

ढंग से मिलता भी नहीं, और बिछुड़ता भी नहीं




आजकल 'वो', मेरी पलकों से उतरता भी नहीं ,
लाख समझाऊँ , वो अंजाम से डरता भी  नहीं  !

आँख जो बंद करूँ,     ख्वाब में आ जाता है,
इतना जिद्दी है के फिर, ख्वाब से टरता भी नहीं !

उसको यूँ,  मुझको सताने की जरूरत क्या है ?
तंग करता है महज़ , प्यार तो करता भी नहीं  !

यूँ तो कहता है, ....चलो चाँद सितारों पे चलें ,
रहगुजर बनके, मेरे साथ गुजरता भी नहीं  !

कभी कातिल,  कभी मासूम नज़र आता है ,
ढंग से मिलता भी नहीं, और बिछुड़ता भी नहीं !

कह नहीं सकता,  उसे प्यार है मुझसे या नहीं, 
हाँ वो कहता भी नहीं , साफ़ मुकरता भी नहीं  !

हाल 'आनंद' का,  ...मुझसे नहीं देखा जाता  ,
ठीक से जीता नहीं ,  ठीक से मरता भी नहीं !

    --आनंद द्विवेदी २९-०४-२०११     

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

सोच समझकर करना



किसी को प्यार करो सोंच समझकर करना
दिल-ए-बेजार करो, सोच समझकर करना 

इश्क सुनता है भला कब नसीहतें किसकी
हज़ार बार करो,   सोच समझ कर करना  

एक लम्हा है जो गुजरा तो फिर न आएगा 
जो इंतजार करो,   सोच समझ कर करना   

प्यार की हद से गुजरने की बात करते हो 
हदें  जो पार करो, सोच समझ कर करना  

जानलेवा तेरी नज़रों को,   लोग कहते हैं 
जो कोई  वार करो,  सोच समझ कर करना  

मैंने 'आनंद' के देखे हैं,   अनगिनत चेहरे 
जो ऐतबार करो , सोच समझ कर करना  

        --आनंद द्विवेदी २८-०४-२०११

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

कोई शिकवा ही नहीं उसको मुकद्दर के लिये




दो घड़ी भी न मयस्सर हुई ,.. बसर के लिए 
ख्वाब लेकर के मैं आया था उम्र भर के लिए !

कौन जाने कहाँ से, ...  राह दिखादे  दे कोई,
रोज बन-ठन के निकलता हूँ तेरे दर के लिए !

तेरी महफ़िल को,  उजालों की दुआ देता हूँ , 
मैं ही  माकूल नहीं हूँ, ....तेरे शहर के लिए  !

रास्ते  भर,   तेरी यादें ही  काम  आनी  हैं ,
घर में माँ होती तो देती भी कुछ सफ़र के लिए !

दिल को समझाना भी मुस्किल का सबब होता है 
आज फिर जोर से धड़का है  इक नज़र के लिए  !

सिर्फ अहसास  नहीं  हूँ,  वजूद  है  मेरा  ,
मैं बड़े काम का बंदा हूँ किसी घर के लिए  !

अजीब शख्स है 'आनंद', ...फकीरों की तरह ,
कोई शिकवा ही नहीं  उसको मुकद्दर के लिए !

    ---आनंद द्विवेदी २५-०४-२०११

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

ख़त लिख रहा हूँ तुमको.....



न दर्द,   ... न दुनिया के सरोकार लिखूंगा,
ख़त लिख रहा हूँ तुमको, सिर्फ प्यार लिखूंगा !

तुम गुनगुना सको जिसे , वो गीत लिखूंगा ,
हर ख्वाब लिखूंगा,  .. हर ऐतबार लिखूंगा  !

पत्थर को  भी भगवान,  बनाते रहे हैं जो , 
वो भाव ही लिक्खूंगा , वही प्यार लिखूंगा !  

दुनिया से छिपा लूँगा, तुम्हें कुछ न कहूँगा ,
गर नाम भी लूँगा, तो  'यादगार' लिखूंगा  !

सौ चाँद भी देखूं जो,   तुझे देखने के बाद ,
मैं एक - एक  कर, ...उन्हें बेकार लिखूंगा !

अपने लिए भी सोंचना है मुझको कुछ अभी,
'आनंद' लिखूंगा,... या  अदाकार  लिखूंगा  !

     --आनंद द्विवेदी , २३-०४-२०११

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

रह रह के अपनी हद से गुजरने लगा हूँ मैं






बेख़ौफ़ होके, .. सजने संवरने लगा हूँ मैं,
जब से तेरी गली से गुजरने लगा हूँ मैं !

कुछ काम, जो सच्चाइयों को नागवार थे ,
वो झूठ बोल बोल कर, करने लगा हूँ मैं  !

गज़लों में आगया कोई सोंचों से निकल कर,
शेर-ओ-शुखन से प्यार सा करने लगा हूँ मैं !

वो एक नज़र हाय क्या वो एक नज़र थी ,
रह रह के अपनी हद से गुजरने लगा हूँ मैं!

मुझको  कोई पहचान न बैठे  , इसी डर से  ,
अब गाँव को भी,  शहर सा करने लगा हूँ मैं !

'आनंद' फंस गया है,  फरिश्तों के फेर में ,
अब जाँच परख खुद की भी करने लगा हूँ मैं! 

   --आनंद द्विवेदी  २२-०४-२०११ 

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

वादा कर लूँगा मगर साफ़ मुकर जाऊँगा






तेरे नजदीक से होकर..... जो गुजर जाऊँगा ,
कह नहीं सकता जियूँगा, कि मैं मर  जाऊंगा !

उनका आगाज़ ही लगता है क़यामत मुझको, 
उनको डर था कि मैं,  अंजाम से डर जाऊँगा  !

मुझको मयख्वार बनाती हुई, नज़रों वाले ..,
मैक़दे बंद ना  करना  , मैं  किधर जाऊँगा  !

तेरे दर से मुझे ,  .मंजिल का गुमाँ होता है ,
मैं जरा देर भी ठहरा,... तो ठहर जाऊँगा  !

इक  हसीं ख्वाब के जैसा,  वजूद है मेरा ,
दो घडी पलकों पे रह लूँगा उतर  जाऊँगा !

मुझपे 'आनंद' की सोहबत का असर है यारों,
वादा कर लूँगा मगर,  साफ़ मुकर जाऊँगा !!

   ---आनंद द्विवेदी १८-०४-२०११ 

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

इन प्यार की बातों से...




मेरे यार की बातों से, इजहार  की बातों से ,
हंगामा तो होना था, इन प्यार की बातों से !

मैं वो ग़मजदा नहीं हूँ  हैरत न करो यारों,
मैं जरा बदल गया हूँ , इकरार की बातों से !

वो उदास सर्द लम्हे, तनहाई ग़म की किस्से,
मेरा लेना देना क्या है,  बेकार की बातों से !

वो कशिश वो शोखियाँ वो, अंदाजे हुश्न उनका 
फुरसत कहाँ है मुझको , सरकार की बातों से  !

मेरी धडकनों पे काबिज ..मेरी रूह के सिकंदर,
मेरा दम निकल न जाए, इनकार की बातों से !

तेरा  रह गुजर नहीं हूँ,  ...ये  खूब जानता  हूँ
तेरे साथ चल पड़ा हूँ , ..ऐतबार की बातों से  !

'आनंद' मयकदे तक पहुंचा तो कैसे पंहुचा ? 
ये राज खुल न जाए,   तकरार की बातों से !

   --आनंद द्विवेदी १६-०४-२०११ 

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

ठहरो चाँद ....!




बरसों बाद 
मेरी खिड़की  पर 
आज 
चाँद आकर ठहर गया है
हू-ब-हू  वही चाँद 
वही नाक नक्श, वही चांदनी 
बादलों की ओट में 
वही लुका छिपी  
वही शरारतें ..

इस बार नहीं जाने दूंगा ..
नहीं करूंगा 
रत्ती भर संकोच
बाँहों में भर लूँगा
हर कतरा
चांदनी....तुम्हारी!    

इतने दिन 
कहाँ थे तुम ?
तुम्हें 
मेरे गीत पसंद थे न  
देखो 
मैंने कितने गीत लिखे है
इनका हर लफ्ज़  
कितना तुम्हारा है 
आज सुनाऊंगा तुम्हें 
कम से कम 
एक गीत  मैं !

आज पूनम है 
खूब सारा वक़्त है न तुम्हारे पास 
अब से पहले 
न कभी 
ऐसी पूनम आई 
न कभी 
ऐसा वक़्त 
आज रुकोगे न तुम?
जल्दी मत करना 
आज ही 
जी लेनी है मुझे... 
अपनी सारी उम्र 
मुझे कल पर 
जरा भी ऐतबार नहीं !!

-आनंद द्विवेदी 
१५-०३-२०११

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

उफ्फ् फिर सपने ...



सुबह से.. 
एक सादा पन्ना 
नाच रहा है 
आँखों के सामने
रात में
इसी पर मैंने 
रंग बिरंगी स्याही से
सब कुछ तो लिख दिया था ...

मैंने लिखा था 
तुम्हारी मुस्कान 
तुम्हारी शराफत 
तुम्हारा प्यार 
तुम्हारी लापरवाही 
तुम्हारी इबादत 
तुमको 

मैंने लिखा था 
अपनी आरजू 
अपनी गिड़गिड़ाहटें  
अपनी बेबसी ... 
अपना जुजून 
वो भी सब 
जो आज तक मैंने
तुमको नहीं बताया था 
खुद से भी ..
चुराए हुए था जो राज ...

पर सुबह...
देखा तो... 
पन्ना तो सादा ही था ..

निगोड़े सपने 
रात में भी  तंग करते हैं 
और दिन में भी !

-आनंद द्विवेदी  
अप्रैल १४, २०११ 

रविवार, 10 अप्रैल 2011

मुझको अक्सर भड़काते है ये सपने


क्या क्या सपने दिखलाते हैं ये सपने,
एकदम पीछे पड़ जाते हैं,  ये सपने   !

मैंने हर खिड़की दरवाजा बंद किया था,
जाने किस रस्ते आते हैं,  ये सपने    !

इनको मालूम है मैं इनसे डरता हूँ,
मुझे डराने आ जाते हैं,   ये सपने !

इनको अक्सर मैं समझाकर चुप करता हूँ,
मुझको अक्सर भड़काते  हैं,   ये सपने  !

जब-जब इनके डर से नींद नहीं आती है,
तब-तब दिन में आ जाते हैं,  ये सपने !

वैसे तो ये अक्सर,  झूठे  ही  होते  हैं,
कभी-कभी सच दिखलाते हैं, ये सपने !

जब-जब  मेरी हार, मुझे  तडपाती   है ,
तब-तब आकर  समझाते  हैं, ये सपने !

ये 'आनंद' गया तो , लौटे   न  लौटे ,
इसी बात से  घबराते  हैं, ये सपने ! 

--आनंद द्विवेदी ०९-०४-२०११ 

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

क़तरा क़तरा एक समंदर सूख गया





लम्हा लम्हा करके लम्हा छूट  गया
क़तरा  क़तरा एक समंदर सूख गया  !

और हादसों के डर से, वो तनहा था  ,
तनहा तनहा रहकर भी तो टूट गया !

मैं कहता था न, ज्यादा सपने मत बुन, 
वही हुआ , सपनों का दर्पण टूट गया  !

फिर कोई मासूम सवाल न कर बैठे ,
बस इस डर से ही, मैं उससे रूठ गया  !

मेरी फाकाकशी  सभी को मालूम थी ,
फिर भी कोई आया  मुझको लूट गया

उसकी बातों से तो ऐसा लगता  था ,  
जैसे कोई दिल का छाला फूट गया !

जो 'आनंद' नज़र आता है, झूठा है ,
उसका सच तो कब का पीछे छूट गया !

  --आनंद द्विवेदी ०९/०४/२०११ 

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

नया ब्लेड




कल देखा है तुम्हें बहुत गौर से
मैने अपनी कविता में
तुम खड़े थे
तुम हंस रहे थे 
तुम मुस्करा रहे थे
तुम कुछ कह रहे थे शायद
मैं केवल सुन रहा था और सोंचे जा रहा था कि
जज्बात तो हैं ....संभालना इन्हें.....खेलना मत
बढ़ते जाना
पैरों के नीचे मत देखना कभी भी
वहां रूकावट होती है ....पैरों के पास
किसी के कुचले जाने का डर भी
दर्द की चादर ओढ़े रहना
दर्द को जीना नही
चादर उतारने में ज्यादा सहूलियत होती है.
जीवन बदलने की बनिस्बत!

फिर बाद में जब  तुमने ठुकराया न 
मुझे... 
तभी अचानक मुझे भी 
समझ में आगया था 
कि विद्वान लोग 'अटैचमेंट ' को 
इतना बुरा क्यूँ कहते हैं
पहली बार  दर्द से जीत गया मैं 
थैंक्स अ लाट आपको
मुझे जरा  भी दर्द नहीं  हुआ 
जैसे एकदम नया ब्लेड निगल लिया हो 
बड़ी सफाई  से अन्दर तक  काटा है
बिना कोई दर्द दिए 
ये कला भी सब के पास कहाँ होती है 
पर एक बात है
मैं भी बहुत ढीठ आदमी हूँ.
देखना फिर पडूंगा अटैचमेंट के चक्कर में
मैंने कब कहा कि...
मैंने  प्यार करना छोड़ दिया है
मैंने कोई चादर थोड़े ओढ़ी थी
जो उतार दूँ
तुम एक  नया ब्लेड लेकर रख लो
मैं जल्दी ही फिर आऊंगा !

      --आनंद द्विवेदी ०६/०४/२०११