मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

इंतजार

मैं विदा नहीं करता किसी को भी
चले जाते हैं सब के सब
अपने आप ही,
अपने स्वयं के जाने तक
मुझे देखना है बस सबका
आना और आकर चला जाना

इस उम्मीद में हूँ कि
शायद कोई ठहरे
पूछे
कि कैसे हो,
कोई कहे
कि आओ साथ चलें,  
मगर एक इंतजार के सिवा
कोई ठिठकता भी नहीं अब पास

इंतजार कुछ कहता नहीं
मैं भी कुछ पूछता नहीं,
हम दोनों हैं
मौन,
एक दूसरे से ऊबे हुए
एक दूसरे के साथ को अभिशप्त !

 - आनंद

रविवार, 29 दिसंबर 2013

कैसे जानूँ तुझे



तुम हो
क्योंकि मेरा वज़ूद है अब तक
और कैसे जानूँ  तुमको 
सिवाय जीवन की तरह अनुभव करने के,
तुम्हें और खुश करने के हज़ार जतन ढूँढता है मन 
जब होते हो तुम खुश,
ढूँढता है मनाने के लाख बहाने
जब होते हो नाखुश, 
डूबता है तुम्हें उदास देखकर 
नाचता है तुम्हारी अल्हड़ता से 
गर्वीला हो उठता है…पास पाकर तुम्हें, 
एक मौन सा पसर जाता है जीवन पर 
तुम्हें पाकर दूर 

तुम इसे प्रेम मानो या न मानो 
मैं इसे जीवन मानूँ या न मानूँ 
सच यही है कि  
मेरे तुम्हारे इन सम्बन्धों में 
तुम न होकर भी हर पल व्याप्त हो 
किसी अनचीन्हें ईश्वर की तरह 
मैं हर पल होकर भी कहीं नहीं हूँ
नश्वर संसार की तरह

तुम सत्य हो
मैं कथ्य
तुम चेतन हो
मैं जड़ 
और हमारे संयोग का नाम है
'जीवन' !


- आनंद 

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

अपना ऐसा ही अफ़साना है भैया ...

अपना ऐसा ही अफ़साना है भैया
पपड़ी ताजी ज़ख्म पुराना है भैया

कौन किसी की गलियों में डेरा डाले
ठहरे जब तक  आबो दाना है भैया

सब के होंठों पर है बात मोहब्बत की
अन्दर झाँको तो वीराना है भैया

उसने अबतक यारों के ही क़त्ल किये
मेरा जिस शै से याराना है भैया

बरसाती नदियों के जिम्मे खेत हुए
सपनों की ही फ़सल उगाना है भैया

अरबों के आश्रम वाले बाबा बोले
खाली हाथ जहाँ  से जाना है भैया

हमने भी तो पत्थर को भगवान किया
अब किसको फ़रियाद सुनाना है भैया

- आनंद







गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

सपना

छोड़ दूँ
एक ख़ुशबू
तुम्हारे आसपास
एक भरोसा
तुम्हारे भीतर
एक साथ
तुम्हारे अहसासों में
एक गुनगुनाहट
तुम्हारे जीवन में
एक सपना
तुम्हारी आँख में
एक टीस
तुम्हारे एकांत में

फिर चला जाऊँगा
जितनी दूर तुम कहोगी
उतनी दूर
तुम से
जीवन से ...
तब तक देखने दो मेरी
अंधेरे की अभ्यस्त आँखों को
रोशनी का एक सपना
एक सपना
किसी के साथ का !

- आनंद

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

ज़िद्दी बच्चा ...!

एक जिद्दी बच्चा सा है
मेरे ही अंतर्मन का एक हिस्सा
भरी महफ़िल में पकड़कर खींच लेता है
एकांत की तरफ
उत्सव में उदासी की तरफ
चमकती आँखों में आँसू की तरफ
चिर असंतुष्ट कहीं का,
समझाता हूँ, मनचाहा नहीं संभव यहाँ
जबाब देता है ...
कि न्यूनतम है उसकी चाहत
फुसलाने की हर कोशिश नाकाम देख
स्वीकार लेता हूँ झट से हार
'चाँद खिलौना' लगती है अब छोटी से छोटी माँग,

न खुद को न्यूनतम दे सकता हूँ
न उसको
अधिकतम यही संभव है
कि चाहतों से बचा जाए,
पर वो बच्चा
मेरी सुने तब ना !

- आनंद