मंगलवार, 30 अक्तूबर 2018

निकल पड़े

दुनिया भर का दर्द भगाने निकल पड़े
हम भी अपना जी बहलाने निकल पड़े

दिल की गलियों से जीवन की राहों तक
कदम कदम पर धक्के खाने निकल पड़े

त्यौहारों पर यादें भी घर आती हैं
मुँह से कुछ अशआर पुराने निकल पड़े

कल नुक्कड़ पर जाने किसका ज़िक्र हुआ
दिल में सारे दफ्न ज़माने निकल पड़े

सच के नाके पर जिनकी तैनाती थी
वो ले दे कर काम बनाने निकल पड़े

जिनको नाम कमाने की कुछ जल्दी थी
लेकर झूठ, फ़रेब, बहाने, निकल पड़े

कई पीढ़ियों से जो हमको लूट रहे
वो भी मुल्क़ मुल्क़ चिल्लाने निकल पड़े

सोशल नेटवर्किंग में घर की फिक्र किसे
सब बाहर की आग बुझाने निकल पड़े

हम देसी गुड़ हैं, जाड़ों भर अच्छे हैं
कुछ दिन का आनंद लुटाने निकल पड़े।

© आनंद

शनिवार, 22 सितंबर 2018

बीता साल...

कोंछ में जिंदगी के दिन भरकर
धरती ने लगा लिया
इसी दरमियान
सूरज का पूरा एक चक्कर,

जहाँ जहाँ तनिक छाया मिलती
वो दौड़ लगा देती
और जैसे सुस्ताने लगती, पाकर तपती धूप
कई बार मृत्यु अच्छी लगी जिंदगी से
तो कई बार लड़ी जाने वाली जंग ज्यादा भली लगी मृत्यु से

तुम्हारे काजल की स्याही को छाया बना हम
जी गए लंबे लंबे दुःख
दुखों के सफर में
अकेला न होना
सफर खत्म होते होते आखिर हो ही जाता है
सुखों का सफर !

आओ साथ मनाएँ
अपने सुखों और दुखों की वर्षगाँठें
कि
ये तुम्हारी ही मुहब्बत थी
जिसकी बदौलत मैं
सलामत बच सका
धरती के इस सालाना जलसे में !

© आनंद

रविवार, 20 मई 2018

जो किया अच्छा किया संसार ने

बेंच डाला घर किराएदार ने
रूह तक कब्ज़ा किया व्यापार ने

छटपटाता वक़्त, बेपरवाह हम
हाल ऐसा कर दिया बाज़ार ने

ज़िंदगी का इम्तहाँ मैं पास था
फेल मुझको कर दिया रफ़्तार ने

दूरियों की आँच यूँ भी कम न थी
आग में घी कर दिया सरकार ने

लज़्ज़त-ए-नाराजगी भी खूब है
जब कभी दिल से मनाया यार ने

अब खुशी में भी कहाँ 'आनंद' है
ठग लिया जबसे भले व्यवहार ने

शुक्र बन्दे का ख़ुदा का शुक्रिया
जो किया अच्छा किया संसार ने

© आनंद

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

अकथ

सुबह उगते हुए सूरज को देखना
देखना ओस की कोई अकेली बूँद
खय्याम की रुबाई से रूबरू होना
या फिर गुनगुनाना मीर की ग़ज़ल
आफिस की मेज़ को बना लेना तबला
और पल भर को  जी लेना बचपन
ऐसा ही कुछ कुछ है तुम्हारा अहसास
जिसे मैं ठीक से कह नहीं पा रहा हूँ 
कभी सुनो मेरे ठहाकों में खुद को
कभी पढ़ो मेरे आँसुओं में अपनी कविता
कि ढूंढो मेरे अंधेरो में अपनी छाया
और लहलहाओ मेरे मौन में बनकर सरगोशियों की फ़सल

युगों से तुम्हें कहने की कोशिश में हूँ
मगर एक भी उपमा नहीं भाती मन को
रह जाते हो तुम हमेशा ही अकथ
जैसे अनकही रह गयी मेरी वेदना
अनलिखी रह गयी मेरी कविता
जैसे अनछुआ रह गया एक फूल
जैसे अनहुआ रह गया मेरा प्रेम
कि जैसे अनजिया बीत गया एक जीवन

सुनो !
कहीं तुम भी
किसी का जीवन तो नहीं ?

© आनंद

शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

और कुछ है

हमें ये ग़म नहीं है और कुछ है
वही हमदम नहीं है और कुछ है

चिताएँ देह की ठंढी हुईं पर
जलन मद्धम नहीं है और कुछ है

दुखों की कब्रगाहें कह रही हैं
समय मरहम नहीं है और कुछ है

पखेरू फड़फड़ाकर लौट आया
कफ़स बेदम नहीं है और कुछ है

नफ़रतें बस मोहब्बत की जिदें हैं
मरासिम कम नहीं है और कुछ है

महक़ते गेसुओं की गुनगुनाहट
महज़ सरगम नहीं है और कुछ है

भला आनंद को कैसी विकलता
ये रंज़ोंग़म नहीं है और कुछ है ।

© आनंद