रविवार, 3 जून 2012

एक विज्ञापन ...जो अक्षरसः सत्य है ..पर शायद गैरकानूनी है

यह न कोई शिगूफा है ...न कोई कविता और न ही चर्चा में आने का सस्ता हथकंडा

मैं (आनंद द्विवेदी) खुद को बेंच रहा हूँ ! और चूँकि मैं इसी समाज में रहता हूँ इसलिए ये बात सोशल नेटवर्किंग के जरिये भी कह रहा हूँ, मैं  बहुत गंभीर हूँ इसलिए आपसे गुजारिश है कि 'आफर दस्तावेज' को बहुत ध्यान से पढ़िए !
पहले प्रोडक्ट परिचय
आनंद द्विवेदी 
स्नातक 
उम्र ४३ वर्ष ! पब्लिक रिलेशंस के क्षेत्र में २० साल का अनुभव
शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ, जिम्मेदार, इमानदार, बात के पक्के (इन बातों का वाणिज्यिक रूप से कोई महत्त्व नहीं)
किसी भी तरह का कोई संक्रामक रोग नही |

प्रोडक्ट की कीमत
25,00000 ( रूपये २५ लाख मात्र ) किसी को यह रकम बहुत ज्यादा लग सकती है किसी को कम ..पर मेरे लिए न कम है न ज्यादा

अब
प्लस प्वाइंट और रिस्क फैक्टर
पहले प्लस प्वाइंट
१- देसी और मेहनती आदमी है | गांव में किसानी के सारे कामों से लेकर शहरी जिंदगी के सारे कामो को बखूबी अंजाम दे सकता है !
२- घर में झाड़ू पोंछा से लेकर घर के सारे काम (खाना बनाना नहीं आता) ऑफिस मैनेजमेंट कम सुपरविजन, फैक्ट्री में कोई भी काम | काम अगर बहुत टेक्नीकल है तो बंदा भी बहुत कुशाग्र बुद्धि का है कोई भी बात दो बार से ज्यादा नहीं समझानी पड़ती |
३- कंप्यूटर से सम्बन्धित सारे वो काम जो एक आम ऑफिस के लिए जरूरी होते हैं |
४- अगर पढ़ने और लिखने की खुली  छूट दी जाये तो...इन्वेस्ट की गयी रकम आश्चर्यजनक रूप से बहुत जल्दी रिकवर की जा सकती है |
५- जिंदगी और समाज की अपनी उम्र से ज्यादा समझ है ... कभी भी इसका उपयोग किया जा सकता है !
६- बिकने के तुरंत बाद से ही शरीर, नाम और मजहब स्वयं का नहीं क्रेता (खरीददार) के अनुसार रहेगा  और क्रेता के  पूर्ण स्वामित्व में रहेगा | और इसी से यह बात भी साफ़ है कि क्रेता को पूर्ण अधिकार होगा कि वो इस शरीर को कैसा खाना दे कितना दे ...क्या पहनने को दे क्या ना दे  जैसे रखना चाहे रखे ! 
७- क्रेता को जब भी लगे कि अब प्रोडक्ट उसके काम का नहीं रह गया है वह उसे तत्काल मुक्त हो सकता है ! क्रेता का प्रोडक्ट पर स्वामित्व तो रहेगा ..मगर कोई भी जिम्मेदारी नहीं !
अब रिस्क फैक्टर
१- प्रोडक्ट नवंबर में ४४ साल का हो जायेगा .... युवाओं की तरह बहुत अधिक शारीरिक श्रम की उम्मीद ना करें 
२- सौदा 'संपन्न' होने के बाद प्रोडक्ट डिलवरी में ४ से ५ दिन का समय लगेगा (ये समय कुछ देनदारियां निपटाने और गांव कि कुछ पुश्तैनी अचल संपत्ति को परिवार के नाम हस्तांतरित करने में लगेगा इस दौरान क्रेता या उसका कोई नामित प्रतिनिधि प्रोडक्ट को अपनी निगरानी में रख सकता है )
३- चूँकि प्रोडक्ट एक शरीर भी है  जिसकी कोई गारंटी नहीं होती ...इसलिए क्रेता को प्रोडक्ट का बीमा करवाने की सलाह दी जाती है !
नोट :- यह एक फेसबुकिया स्टेटस नहीं है ...इसे लाइक और इस पर कमेन्ट ना करें ! इच्छुक खरीददार  anandkdwivedi@gmail.com पर मेल करें | मेमोरंडम ऑफ़ अन्डरस्टैंडिंग  बनवाते समय कानूनी पहलुओं का ध्यान रखा जायेगा और ये खरीददार और प्रोडक्ट जैसे शब्द वकील की सलाह के अनुसार हटाये जा सकते हैं |
धन्यवाद !

शुक्रवार, 25 मई 2012

मैं उस जमाने का हूँ ... कवितानुमा एक कथा !






मैं उस जमाने का हूँ 
जब 
दहेज में घड़ी, रेडियो और साइकिल
मिल जाने पर लोग ...फिर 
बहुओं को जलाते नहीं थे 
बच्चे 
स्कूलों के नतीजे आने पर 
आत्महत्या नहीं करते थे 
बल्कि ... स्कूल में मास्टर जी 
और घर में पिताजी,  उन्हें बेतहासा पीट दिया करते थे
बच्चे चौदह-पन्द्रह साल तक 
बच्चे ही रहा करते थे 
तब 
मानवाधिकार कम लोग ही जानते थे !

मैं उस जमाने का हूँ 
जब 
कुँए का पानी 
गर्मियों में ठंढा और सर्दियों में गरम होता था 
घरों में फ्रिज नहीं मटके और 'दुधहांड़ी' होती थी  
दही तब  सफेद नहीं 
हल्का ललक्षों हुआ करता था 
सर्दियों में कोल्हू गड़ते ही
ताज़े गुड़ की महक....अहा !  लगता था 
धरती ने आसमान को खुश करने के लिए 
अभी अभी 'बसंदर' किया हो
अम्मा 
गन्ने के रस में चावल डालकर 'रस्यावर' बना लेती थी 
आम की  बगिया तो थी पर 'माज़ा' नहीं 
'राब' का शरबत तो था  
पर कोल्डड्रिंक्स नहीं
पैसे बहुत कम थे
पर  जिंदगी  बहुत मीठी !

मैं उस जमाने का हूँ 
जब 
गर्मियां आज जैसी ही होती थीं 
पर एक अकेला 'बेना'
उसे हराने के लिए काफी होता था 
दोपहर में अम्मा, बगल वाली दिदिया
और उनकी सहेलियों की महफ़िल 
'काशा' और 'फरों' की रंगाई 
'
डेलैय्या' और 'डेलवों' की एक से बढ़कर एक डिजायनें और उनपर नक्कासी 
सींक से बने 'बेने' और उनकी झालरें
कला ! तब सरकार की मोहताज नहीं थी
बल्कि जीवन में रची बसी थी !

मैं उस ज़माने का हूँ 
जब 
गांव में खलिहान हुआ करते थे 
मशीनें कम थीं 
इंसान ज्यादा 
लोग बैल या भैसो कि जोड़ी रखते थे 
महीनों 'मड्नी' चलती थी 
तब फसल घर आती थी
'
कुनाव' पर सोने का सुख 
मेट्रेस पर सोने वाला क्या जाने 
अचानक आई आंधी से भूसा और अनाज बचाते हुए ..हम 
न जाने कब 
जिंदगी की आँधियों से लड़ना सीख गये 
पता ही नही चला !

मैं उस जमाने का हूँ 
जब 
किसान ...अपनी जरूरत की हर चीज़ ...जैसे
धान, गेंहू, गन्ना, सरसों, ज्वार, चना, आलू , घनिया
लहसुन, प्याज, अरहर, तिल्ली और रामदाना ....सब कुछ
पैदा कर लेता था
धरती आज भी वही है ...पर आज 
नकदी फसलों का ज़माना है 
बुरा हो इस 'पेरोस्त्राईका' और 'ग्लास्नोस्त'  का 
बुरा हो इस आर्थिक उदारीकरण  का 


जिस पैसे के पीछे इतना जोर लगा के दौड़े 
अब 
 तो उस पैसे की कोई कीमत है 
और न इंसान की !!

-
आनंद द्विवेदी
२५ मई २०१२ 

शुक्रवार, 11 मई 2012

वक्त की बात ...


मुस्कराहट बहुत जरूरी है,  इसलिए   मुस्करा रहा हूँ मैं,
यार कोई तो मर्सिया पढ़ दो, आख़िरी ख़त जला रहा हूँ मैं |

कितनी हसरत से एक दिन मैंने, तेरे कूचे में घर बनाया था,
'वक़्त की बात' इसे कहते हैं, अब वही घर जला रहा हूँ मैं  |

रक्खे रक्खे ख़राब होने हैं, ख्वाब अब काम के नही मेरे,
सोंचता हूँ के बेंच दूं इनको, आज बाज़ार जा रहा हूँ मैं  |

मंजिलें कब किसी कि होती हैं, साथ अपने सफ़र ही रहता है,
आओ तन्हाइयों यहाँ से चलें, अब कहीं और जा रहा हूँ मैं |

जिन्दगी! वाह जिंदगी मेरी, तू भी उसकी हुई तो हो ही गयी,
पहले दिल था जहाँ पे सीने में, अब मज़ारें बना रहा हूँ  मैं |

लाख 'आनंद' से कहा मैंने,  तू उसे भूल क्यों नही जाता,
सिरफिरा रोज यही कहता है, सारी दुनिया भुला रहा हूँ मैं |

-आनंद
०९/०५/२०१२ 

रविवार, 29 अप्रैल 2012

लड़कियां ....







मुस्किल से, जरा देर को सोती हैं लड़कियां,
जब भी किसी के प्यार में होती हैं लड़कियां |

'पापा' को कोई रंज न हो, बस ये सोंचकर,
अपनी हयात ग़म में डुबोती हैं लड़कियां  |

फूलों की तरह खुशबू बिखेरें सुबह से शाम,
किस्मत भी गुलों सी लिए होती हैं लड़कियां |

'उनमें'...किसी मशीन में, इतना ही फर्क है,
सूने  में  बड़े  जोर  से,  रोती  हैं  लड़कियां |

टुकड़ों में बांटकर कभी,  खुद को निहारिये,
फिर कहिये, किसी की नही होती हैं लड़कियां |

फूलों का हार हो,  कभी बाँहों का हार हो ,
धागे की जगह खुद को पिरोती हैं लड़कियां |

'आनंद' अगर अपने तजुर्बे  कि  कहे तो,
फौलाद हैं,  फौलाद ही होती हैं लड़कियां  |

-आनंद द्विवेदी
२९ अप्रेल २०१२


मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

झूठे हम ...




तुमने कहा.... 
प्रेम ही ईश्वर है 
मैंने मान लिया 
तुमने कहा....
मैं बुद्धू हूँ 
पागल हूँ 
दीवाना हूँ 
मैंने मान लिया 
तुमने कहा..... 
मैं जब भी तुम्हारे पास होती हूँ 
अपने सहज रूप में होती हूँ
अपने स्व में होती हूँ
मैंने मान लिया 
तुम तो हर बात साक्षी भाव से देखते थे न 
तुमने कहा .....
हमें विधाता ने मिलाया है 
ये मिलन अनायास नहीं है 
बल्कि ये रूहों का मिलन है 
मैंने मान लिया 
तुमने कहा .....
तुम न मिलते तो 
अपूर्ण ही रहती मैं 
मैंने मान लिया |

फिर एक दिन ...
तुमने कहा 
हमारा साथ इतने ही दिन का था 
मैंने मान लिया 
तुमने कहा 
तुम्हारे जीवन में मेरी भूमिका पूरी होती है 
मैंने मान लिया 
फिर तुमने कहा 
हमारा मिलना महज़ इत्तेफ़ाक था
मैं चुप रहा 
और सोंचता रहा कि 
परिवर्तन तो जीवंतता की निशानी है 
इससे यही तो साबित होता है कि तुम जीवंत हो 
मगर फिर तुमने कहा ....
सोंच लेना हम राह चलते हुए 
ऐसे ही 'टकरा' गए थे 
उफ्फ़
कैसे कह पाए तुम ये 
पहली और अंतिम बात 
अंतिम ....जो तुमने कही थी
और पहली ...जिसे मैं मान नहीं पाया |

और मैं ...
मैंने तो हर बार एक ही बात कही 
कि मैं.... तुम्हारे बगैर जी न पाऊंगा |
देखो तो ....
कैसे जीवन ने 
हम दोनों को ही 
झूठा साबित कर दिया ||

आनंद 
२४ अप्रेल २०१२ 

एक गीत शिद्दत से याद आ रहा है

http://www.youtube.com/watch?v=u0bfDPsWxQY&feature=fvst

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

कौन याद रक्खे उम्र भर...




कुछ और देखने दे,  जरा जिंदगी ठहर, 
मेरा रकीब कौन है और कौन रहगुजर |

ईमान ही साथी है  तो उसको भी  देख लूं ,
कल तक तो 'यही दोस्त' था मेरा इधर उधर |

जो दो कदम भी साथ चले उसका शुक्रिया,
मुद्दे की बात ये है कि, तनहा है हर  सफ़र |

दो घूँट हलक में गये,  हर दर्द उड़न छू,
बेशक बुरी शराब हो, पर है ये कारगर |

मैं उस जगह से आया हूँ कहते हैं जिसे 'गाँव'
अब तक नही है उसके मुकाबिल कोई शहर |

खड़िया से किसी स्लेट पर लिक्खा गया था तू,
'आनंद' !  तुझे कौन याद  रक्खे  उम्र भर  |

-आनंद
२१ अप्रेल २०१२ 

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

दिल्ली की तरफ ...



ऐसे ही नहीं  आग  लगाते रहे  हैं लोग, 
जलने का सलीका भी सिखाते रहे हैं लोग |

थोड़ी बहुत तो मेरी फिकर भी रही उन्हें,
अपने तमाम फ़र्ज़ निभाते रहे  हैं लोग |

ये करना, ये न करना, नेकी बदी कि राह,
हर पाठ तसल्ली से पढ़ाते रहे  हैं लोग  |  

क्या कीजिये जो कोई दुआ काम न करे,
मेरे  लिए  तो  हाथ  उठाते रहे  हैं लोग |

मैं चल न पडूँ उनकी तरफ, डर था उन्हें भी,
क़दमों के निशाँ तक को, मिटाते रहे हैं लोग |

जब चल पड़े फ़ना की राह, फिर क्या सोंचना...
किस किस तरह से मुझको सताते रहे हैं लोग |

'आनंद' कहाँ खो गया ? जिससे  भी  पूछिए,
दिल्ली कि तरफ हाथ उठाते  रहे हैं लोग  |

आनंद 
९ अप्रेल २०१२.

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

डॉट्स . . . की भाषा !



कभी कभी 
सारा अध्यन ...सारी शिक्षा,
हर किताब 
हर सीख ....और
तुम्हारी समझायी हर बात पर
भारी पड़ जाता है मेरा दर्द |
और ऐसे क्षणों में फिर मैं 
कर बैठता हूँ .....
तुमको एक  'एस एम एस'
जिसमे लिखा होता है केवल एक नाम 
और कुछ डॉट्स. . . बस !

अच्छे से जानता हूँ कि
तुम्हारे निजी संसार में
मेरा इस तरह
रह रह कर जिन्दा होना
तुम्हें जरा भी पसंद नही
पर क्या करूं ?
मैं ये भी तो अच्छी तरह से जानता हूँ ...कि 
सारी दुनिया में केवल
एक तुम्हें ही
उन डॉट्स . . . की भाषा पढ़नी आती है !

"मैं आज भी वहीँ हूँ "
मेरे लिए यह कथन ...
न पूरा सच है न पूरा झूठ
धरती का गुरुत्वाकर्षण 
कुछ तो कमजोर पड़ा है 
अब वह सिमटकर
केवल उतना भर रह गया है
जितनी कि तुम स्वयं
और जिस किसी भी दिन
तुम नही रहोगी ........
मैं झट से 
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र से बाहर चला जाऊंगा
पर
एक बात बोलूं
मेरी जरा भी दिलचस्पी 
न तो निराकार में है 
और न मोक्ष में
मैं तो सृष्टि के अंत तक चलता रहना चाहता हूँ
एक तुम्हारी सुगंध भर लिए हुए
जिससे सुवासित है
मेरी आत्मा .... 
और 
मेरे आने वाले अनेक जन्म !!

आनंद
०६-०४-२०१२  

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

दिल नहीं रहा ....




अब मैं किसी के प्यार के काबिल नहीं रहा, 
इक जिस्म रह गया हूँ महज, दिल नहीं रहा |

कैसे गुमान होता मुझे अपने क़त्ल का, 
जब मैं किसी के ख़्वाब का क़ातिल नही रहा |

जब से किसी ने मुझको तराजू पे रख़ दिया,
अय जिंदगी, मैं तेरे  मुक़ाबिल  नही रहा  |

मँझधार ही नसीब है,  या पार लगूंगा ?
हद्दे निगाह तक कोई साहिल नही रहा |

दुनिया के तकाज़े हैं, खुदगर्ज़ हुआ जाये,
बस एक यही मसला मुश्किल नही रहा |

'आनंद' मिट गया औ भनक भी नही लगी,
पहले तो मैं इतना कभी गाफ़िल नहीं रहा  !

आनंद द्विवेदी 
३० मार्च २०१२ 

सोमवार, 26 मार्च 2012

तू तू ..मैं मैं ...(६)



एक 

माधव !
तुमने किसी माँ को 
रोते हुए देखा है ....
तुमको कैसा लगता है ?
मुझे तो अच्छा नहीं लगता
तुम्हारी नहीं कह सकता मैं 
अच्छा छोड़ो ..
ये बताओ 
क्या तुमने किसी बेटी को 
रोते हुए देखा है ?
मैंने तो देखा है
तुमने भी जरूर देखा होगा
क्योंकि कई बार
मुझे भी ऐसा लगता है  कि ..
तुम ही सबके पिता हो
परम पिता !
न जाने क्यों ऐसा लगता है मुझे 
और खास बात ये कि.... मैंने 
जब जब उसे रोते हुए देखा 
तब तब 
मैंने तुमको भी देखा 
हम दोनों लाचार
वैसे एक राज की बात बताऊँ ??
जब जब मैं तुमको लाचार देखता हूँ ना 
मेरा मन करता है कि 
मैं  जोर जोर से नाचूँ...........!


दो 

मैं सुदामा नहीं हूँ !
और मुझे ऐसा कोई मुगालता भी नहीं है 
फिर भी 
एक पोटली है मेरे पास ...
अरे कांख में दबी हुई नहीं 
इधर सर पे रखी हुई ...
मेरी पोटली में
बहुत सारी चीजें हैं ...जो तुमने
दिया था मुझे
देखो ना 
इसमें है ...
नदी किनारे की एक जादुई शाम
तपते जून की एक दोपहर
तारों भरी  कुछ सर्द रातें (जब चाँद भी अच्छा लगता था )
दीवानों की तरह घुमड़े हुए कुछ बादल 
बच्चों की तरह भीगता
और 
पागलों की तरह खुश होता हुआ मैं !
मेरा वो इंतज़ार
(अब जिसके आगे तुमने 'मूक' और पीछे 'अनंत काल के लिए' लिख दिया है )
देखना ...
एक छोटी सी गांठ में बंधा हुआ 
थोड़ा सा 
भरोसा भी होगा ...
इनमे से एक भी चीज़ 
मेरे काम की नहीं है 
इन्हें वापस ले लो (तुभ्यमेव समर्पयामि)
इन सबके बदले में
मुझे एक चीज़ चाहिए 
और वो ये कि.... 
मुझे अब कुछ नहीं चाहिए
हो सके तो  
मुझे मुक्त करो अब 
नहीं तो जय राम जी की !

आनंद 
२६-०३-२०१२ 

रविवार, 18 मार्च 2012

मैं किससे उज्र करता...



दो चार रोज ही तो मैं तेरे शहर का था,
वरना तमाम उम्र तो मैं भी सफ़र का था |

जब भी मिला कोई न कोई चोट दे गया,
बंदा वो यकीनन बड़े पक्के जिगर का था |

हमने भी आज तक उसे भरने नहीं दिया,
रिश्ता हमारा आपका बस ज़ख्म भर का था |

तेरे उसूल,  तेरा फैसला,   तेरा निजाम,
मैं किससे उज्र करता, कौन मेरे घर का था |

जन्नत में भी कहाँ सुकून मिल सका मुझे,
ओहदे पे वहाँ भी, कोई...तेरे असर का था |

मंजिल पे पहुँचने की तुझे लाख दुआएं,
'आनंद' बस पड़ाव तेरी रहगुज़र का था |

-आनंद द्विवेदी
१८ मार्च २०१२


बुधवार, 14 मार्च 2012

मैं जिंदगी की चोट का ताज़ा निशान हूँ..




ना ही कोई दरख़्त हूँ न सायबान हूँ
बस्ती से जरा दूर का तनहा  मकान हूँ

चाहे जिधर से देखिये बदशक्ल लगूंगा
मैं जिंदगी की चोट का ताज़ा निशान हूँ

कैसे कहूं कि मेरा तवक्को करो जनाब
मैं खुद किसी गवाह का पलटा बयान हूँ

आँखों के सामने ही मेरा क़त्ल हो गया
मुझको यकीन था मैं बड़ा सावधान हूँ

तेरी नसीहतों का असर है या खौफ है
मुंह में  जुबान भी है,  मगर बेजुबान हूँ

बोई फसल ख़ुशी की ग़म कैसे लहलहाए
या तू खुदा है, या मैं अनाड़ी किसान हूँ

एक बार आके देख तो 'आनंद' का हुनर
लाचार परिंदों का,  हसीं आसमान हूँ  !!

-आनंद द्विवेदी
८ मार्च २०१२

बृहस्पतिवार, 8 मार्च 2012

आखिरी क़ैद





कितना फर्क है
मुझमें और तुममें
शरीर की सीढ़ियों के उस पार..तुम
कितनी सहज सी लगती हो
जैसे सवार  हो घोड़े पर, या कि
एक जादुई कालीन है तुम्हारा शरीर
जिस पर चढ़कर तुम
जब चाहो .... जिस लोक में
जा सकती हो
किसी भी
और किसी के भी संसार में ,
दरवाजे के बाहर ही
शरीर को इंतजार करता छोड़कर
बेहिचक , दनदनाते हुए ...
किसी के भी अन्दर तक पंहुच जाना
कितना सुगम है
तुम्हारे लिए !

और एक मैं हूँ ...
एक कदम भी कहीं बढ़ाता हूँ
तो ये शरीर साथ चल पड़ता है
पता नही ये मुझे ढो रहा है
या मैं इसको .
हर समय टकटकी लगाये
ऐसे देखता रहता है...जैसे जन्मों का कर्जदार हूँ इसका
और इस बार सारा वसूलेगा  सूद सहित
या फिर ऐसे देखता है जैसे .
मौत के समय मेरे पापा ने मुझे देखा होगा
तब.... जबकि मैं वहां टाइम से नहीं पहुँच पाया था ...और .........

एक दिन इसकी नज़रों से बचकर
भाग आऊंगा मैं तुम्हारे पास
यह जानते हुए भी कि .... तुम
नही मिलोगी मुझे
फिर भी मैं आऊंगा तो
और साथ लाऊंगा
अपनी बहुत सारी बेवकूफियां
थोड़े से आंसू  ....और
ढेर सारा दीवानापन !
..........
तुम ऐसा करना
मेरे लिए थोड़ा सा  'राजमा चावल'
एक कप चाय ...वैसी ही (दूध कम चीनी बहुत कम और पत्ती ज्यादा )
जरा सी मेंहदी कि खुशबू ...और
एक टुकड़ा...हंसी का
छोड़ जाना बस ...............
मुझे ज्यादा देर तक ये शरीर
क़ैद नही रख़ पायेगा
बाहर आने के लिए मैंने ....
अन्दर ही अन्दर
सुरंगे बनाना शुरू कर दिया है 

-आनंद द्विवेदी
६ मार्च २०१२

 

मंगलवार, 6 मार्च 2012

मोहब्बत के खुदा से एक प्यारी सी भेंट ...( एक संक्षिप्त रिपोर्ट )




फरवरी २०१२ की २७ तारीख..एक बजे ऑफिस से निकल पड़ता हूँ प्रगति मैदान की तरफ , दो बजे से अनुपमा त्रिपाठी  जिन्हें मैं अनुपमा दी बोलता हूँ की पुस्तक अनुभूति का विमोचन था .. तदुपरांत मेरी एक और ब्लागर मित्र  अंजू (अनु० ) चौधरी की पुस्तक 'क्षितिज़ा' का विमोचन होना था ५.०० बजे से |  २५ मिनुत के अन्दर ही पार्किंग और टिकट से फारिग होकर मैं हाल संख्या १२ के सामने खड़ा हुआ था | 
हाल संख्या ११ में हिंद युग्म प्रकाशन के स्टाल पर एक काव्य संग्रह भी रखा हुआ था "अनुगूंज" नाम से उस के २८ कवियों की जमात में मेरा भी नाम था ...यही वजह थी कि कदम सबसे पहले ११ नंबर हाल कि तरफ ही बढे ...खैर दो घंटे एक हाल में ही घूमने के बाद जेब और कुछ और पुस्तकें उठा सकने कि क्षमता दोनों के जबाब देने के बाद ये सोंचता हुआ कि एक दिन में एक ही पवैलियन ठीक से देखा जा सकता है, बाहर निकल पड़ा मैं |
एक दिन पहले जनवादी कवि भाई 'अशोक कुमार पाण्डेय' जी ने सभी साहित्यिक प्रेमियों और सामाजिक सरोकारों से खुद को जुड़ा महसूस करने वालो की एक एक औपचारिक बैठक रखी थी हाल संख्या १२ के सामने लान में ही जो उनकी ही व्यस्तता के कारण निरस्त भी हो गयी थी ..मगर फेसबुक अपडेट से ये पता था कि वो आज यानी २७ को नियत स्थान पर आने वाले हैं ...मैंने सोंचा कि चलो एक बार देख लेते हैं शायद वो मिल ही जाएँ ..और मेरा सौभाग्य कि वो वहीं बैठे दिख गए ..उनसे मुलाकात भी एक सुखद याद रहेगी हमेशा|  बहुत नेक इंसान लगे मुझे .. उनका हाल ही में प्रकाशित और चर्चित काव्य संग्रह "लगभग अनामंत्रित" भी मुझे लेना था जब मैंने उनसे इस बात का जिक्र किया तो वो बड़ी सरलता से मुझे शिल्पायन के स्टाल तक ले गए जहाँ उनकी पुस्तक उपलभ्ध थी |
 बहरहाल  इन सबके बीच मेरी मित्र वंदना गुप्ता जी (मशहूर ब्लागर) का फोन कई बार आ चुका था कि वो मेरा इंतज़ार हाल संख्या ६ में कर रही हैं ...जहाँ पर अनुपमा दी की पुस्तक के विमोचन का कार्यक्रम चल रहा था ...और मैं लगभग ३.३० बजे वहाँ पहुँच पाया ...
       अनुपमा दी का कार्यक्रम  समाप्त होने के बाद वही कोई ४.३० के आसपास हम सभी वंदना जी , अंजू चौधरी जी , सुनीता शानू जी, राजीव तनेजा जी, और अन्य बहुत से मित्र गण सभागार से सामने ही गप्पे मार रहे थे और अगले होने वाले कार्यक्रम की प्रतीक्षा में थे कि सहसा मेरी नज़र ..एक सज्जन पर पड़ती है ...वो एक जगह पर ऐसे खड़े थे जैसे साक्षात् शांति आकार उस जगह ठहर गयी हो , याकि शांति ने ही मनुज का वेश धारण कर लिया हो !

मैंने कभी उनको नहीं देखा था सिवाए अपने अनुज मुकेश कुमार सिन्हा की एल्बम में उनकी एक तस्वीर के ...मगर मेरे मुह से अनायास ही निकल पड़ा अरे वो देखो इमरोज़ जी ...डर भी लग रहा था ...मैंने साथियों से पूछा कि कोई उन्हें मिला है  कोई ठीक से पहचानता है तो सबने कहा नहीं... सुनीता शानू जी ने कहा मेरे पास उनका नंबर है मैं मिला कर देखती हूँ ...वो जब तक फोन मिलाएं हम उनके पास पहुँच चुके थे !
और फिर ....पांव ही तो छूना मुझे समझ में आता है जब भाव नहीं सँभालते तो डाल देता हूँ उन्हें सामने वाले के क़दमों में ...और जब सामने राँझा हो तो .... वंदना जी का और मेरा दोनों का हाल लगभग एक जैसा ही था ...धीरे धीरे लोग छंटने लगे ...सबके जिम्मे जिम्मेदारियों का पहाड़ होता है ... हम और वंदना जी ही बचे वहाँ ....पर मैं तो खुद को सागर तट पर पा रहा था ....

                                         (इन स्मृतियों को कैमरे में कैद करने के लिए वंदना जी का शुक्रिया )

मैं शायद उनको देखता ही रहता अगर वंदना जी ने बात ना शुरू कर दिया होता ...वही बातें आप तो इस धरती पर मोहब्बत का रूप हैं , सच भी है, बड़ा सौभाग्य कि आज आपके दर्शन हुए ...आज का दिन बहुत कि अच्छा है यादगार है वो सुनते रहे बीच बीच में कुछ बोलते रहे रहे ...मगर मैं तो जैसे कुछ ज्यादा ही पी गया था ... बस आँखों से देखे ही जा रहा था अपलक उनको ..इतने आत्मीय इतने मृदु ..सच में प्रेम ऐसा ही होता होगा ...मुझे होश तब आया जब जब वंदना जी ने किसी और से मिलने के लिए मुझसे पूछा तो .... मेरा जबाब था कि अब और मुझे किससे मिलना बाकी रह गया ...इमरोज़ जी को मिलकर फिर और किसी इंसान से मिलने कि तमन्ना ...मेरे लिए जरा मुश्किल थी ...मेरा जबाब सुनकर पहली बार इमरोज़ जी ने मुझे ध्यान से देखा ..उसी क्षण बस एक क्षण को लगा कि मेरे अंदर प्रेम का जो तत्व है वो उनसे मिल गया है ...सहसा उनकी आँखों में अपनेपन का भाव आ गया ...तब केवल हम दो थे वहाँ पर .....या शायद वहाँ केवल प्रेम था ना मैं था न इमरोज़ जी 

उन्हें शायद मेरी दशा का भान  हो गया था...बात का सिरा अपने हाथों में लिया  उन्होंने ...और पहला शब्द उनके मुह से निकला अमृता .... "अमृता ने कभी अपनी किसी किताब की प्रस्तावना किसी से नहीं लिखवाई "  "उन्हें ये सब पसंद ही नहीं था " ...क्योंकि जो भी कुछ लिखता है वो उसकी कीमत वसूलने की कोशिश करता है ..और अमृता को ये सब पसंद नहीं था वो अपने धुन कि पक्की थी !
मैंने मुह खोला कि कुछ ब्लोग्स के सौजन्य से आपकी कुछ नज्में पढ़ी हैं मैंने ...और अमृता जी की कवितायेँ तो खैर पढ़ता ही हूँ मैं ...
वो बोले कि मैं लिखता कहाँ हूँ ..बस ऐसे ही कभी किसी ने कह दिया या कभी कुछ मन हो गया तो ...
मैंने कहा मैंने आपके बहुत सारे चित्र देखे हैं ... आपके चित्रों की नारी ...कितनी कोमल लगती है .... वो मुस्कराए ..केवल मुस्कराए 
थोड़ा रुक कर बोले ... वह  जगह जहाँ से आप चीज़ों को देखते हैं सब की  अलग अलग होती है !
मैंने कहा मुझे यकीं नहीं हो रहा कि मैं प्रेम के मूर्त रूप के सामने खड़ा हूँ ..फिर प्यार से देखा उन्होंने मुझे ..बड़े ही प्यार से ..बोले प्रेम कितने लोग करते हैं आज ??? बातें २४ घंटे प्रेम की ही होती हैं ..सारे पंजाब में हीर और राँझा केवल एक ही क्यों थे ?  नहीं होता ये सबसे ....!  ..... तुम्हें पता है हमने और अमृता ने कभी एक दूसरे को 'आई लव यू ' नहीं कहा ... कहने की  जरूरत ही नहीं पड़ी कभी ...(और मैं सोंच रहा था खुद के बारे में ...मानव का मन भी ना कितनी जल्दी तुलना करने लगता है...कितना जल्दी होती है उसे शिखर तक पहुँचने की )..
   अचानक ही उन्होंने ने पूछ लिया की आप भी लिखते हैं ?  ...मैंने जरा सा संकोच करते हुए कहा हाँ लिखता तो हूँ पर अभी तक कहीं छपा नहीं है ..शायद उन्होंने मेरे संकोच को भांप लिया था एकदम तपाक से बोले कबीर को किसने छापा था  ?? बस लिखते जाओ जो भी लिखो बस दिल से लिखना ...अगर दिल से लिखोगे तो पढ़ने वाले के दिल तक जरूर पहुंचेगा , और जिसको छापना होगा छापेगा तुम इसकी परवाह मत करना ! मैं क्या कहता आज भी उनकी मीठी आवाज में कहे ये शब्द मेरे कानों में गूँज रहे हैं ...
 इसके बाद  दुनिया दरी पर कुछ इधर उधर की बातें हुई ..और तब तक हीर जी हाँ जी सच कह बरह हूँ आज के युग कि हीर सुश्री हरकीरत हीर जी  वहाँ  आ गयीं . उनकी कविताओं का संग्रह दर्द की महक जो कि अमृता प्रीतम और इमरोज़ जी को ही समर्पित थी ..उसका लोकार्पण करने ही तो इमरोज़ जी आये हुए थे उस कार्यक्रम में !

मैं हरकीरत जी कविताओं का (अब आप कविताओं या चाहें तो यूँ कह लीजिए कि उनके दर्द कविताओं के अंदर के दर्द का बड़ा प्रसंसक रहा हूँ ) और  चूँकि हीर जी का ब्लाग नियमित पढ़ता रहता हूँ और उनसे एक दो बार मेल का आदान प्रदान भी हुआ है इस लिए वो मुझे नाम लेते ही पहचान गयीं ! मैंने भी हीर जी को सुनाते हुए इमरोज़ जी से कहा कि  ये लो आ गयीं...मुझे तो  रुलाने का सारा जिम्मा इन्होने संभाल रखा है ...मेरी इस बात पर  दोनों खूब ठहाका लगा कर हँसे !..
इस तरह हम सब ने सभाभवन कि ओर साथ ही प्रस्थान किया ! सारे कार्क्रम के दौरान इमरोज जी जब भी मुझे देखते बड़े प्यार से देखते कार्क्रम के अंत में जाते हुए जब वो मेरी बगल से गुजरे रुक गए मैं भी खड़ा हो गया ... हमने एक दूसरे को देखा  बस वही एक नज़र मेरे लिए बहुत कीमती है उसकी व्याख्या मैं चाह कर भी नहीं कर पाऊंगा !

-आनंद द्विवेदी
६ मार्च २०१२ .

मंगलवार, 28 फरवरी 2012

नाम परिवर्तन ....

मेरे अतिसय प्रिय मित्रों ..कल विश्व पुस्तक मेले में साथी ब्लोगर्स से चर्चा के दौरान सुश्री सुनीता शानू जी ने मुझे कहा कि मेरे ब्लॉग का नाम बहुत बड़ा है और भी  लोगों ने लगभग ऐसा ही कहा मुझे भी लगा कि किसी को  ब्लॉग का नाम बताने में थोड़ा अटपटा लगता है...तत्काल ही एक बहुत बड़े ब्लागर और मेरे अनुज मुकेश कुमार सिन्हा जी ने नाम भी सुझा दिया ..."आनंद"
बस आज से ही ये ब्लॉग हो गया आनंद आप सभी का स्नेह यथावत बना रहे आभारी हूँ !