गुरुवार, 30 जून 2011

तुमने फिर से वहीं मारा है ज़माने वालों







हर तरीका मेरा  न्यारा है,  ज़माने वालों ,
आज कल वक़्त हमारा है, ज़माने वालों !

जख्म रूहों के भरे जायेंगे, कैसे मुझसे ,
तुमने फिर से वहीं मारा है, ज़माने वालों !

दो घड़ी चैन से तुमने जिसे जीने न दिया,
किसी की आँख का तारा है, ज़माने वालों !

बेवजह ही नहीं मैं बांटता, जन्नत के पते,
मैंने कुछ वक़्त गुज़ारा है, ज़माने वालों  !

कौन कम्बख्त भला होश में रह पायेगा ?
जिस तरह उसने निहारा है, ज़माने वालों !

आज 'आनंद' की दीवानगी से जलते हो ,
तुमने ही उसको बिगाड़ा है, ज़माने वालों !

       आनंद द्विवेदी १६-०५-२०११

10 टिप्‍पणियां:

  1. बेवजह ही नहीं मैं बांटता, जन्नत के पते,
    मैंने कुछ वक़्त गुज़ारा है, ज़माने वालों !
    वाह ...बहुत खूब कहा है

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  2. जख्म रूहों के भरे जायेंगे, कैसे मुझसे ,
    तुमने फिर से वहीं मारा है, ज़माने वालों ...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..आभार...

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  3. कौन कम्बख्त भला होश में रह पायेगा ?
    जिस तरह उसने निहारा है, ज़माने वालों !
    bahut khoob , sbhi she'r umda
    agr type thodi moti kar sko to sbhi ko padhne men aasani rhegi

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  4. कौन कम्बख्त भला होश में रह पायेगा ?
    जिस तरह उसने निहारा है, ज़माने वालों !
    बहुत सुंदर।

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  5. कौन कम्बख्त भला होश में रह पायेगा ?
    जिस तरह उसने निहारा है, ज़माने वालों !

    बहुत खूब ..सुन्दर गज़ल

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  6. कौन कमबख्त भला होश में रह पायेगा ?
    जिस तरह उसने निहारा है, ज़माने वालों
    ........................वाह द्विवेदी जी वाह
    ...........क्या शेर है !
    खुबसूरत ग़ज़ल .....हर शेर सुन्दर

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  7. "जख्म रूहों के भरे जायेंगे, कैसे मुझसे ,
    तुमने फिर से वहीं मारा है, ज़माने वालों !"

    "बेवजह ही नहीं मैं बांटता, जन्नत के पते,
    मैंने कुछ वक़्त गुज़ारा है, ज़माने वालों !"

    हमेशा की तरह लाजवाब....

    ":उनकी नज़र-ए-करम कुछ इस तरह होती गई
    होश में हो के भी बेहोश हम होते गए.. "

    ***पूनम***
    बस यूँ...ही..

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  8. कौन कम्बख्त भला होश में रह पायेगा ?
    जिस तरह उसने निहारा है, ज़माने वालों !

    vaah,kya baat hai.

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