मंगलवार, 10 मई 2011

मुझको वादे कुछ मिले थे मैंने पाया और कुछ



अपने स्कूलों  से तो, पढ़कर मैं आया और कुछ ,
जिंदगी जब भी मिली, उसने सिखाया और कुछ!

शख्त असमंजश में हूँ बच्चों को क्या तालीम दूँ  ,
साथ लेकर कुछ चला था, काम आया और कुछ !

आज फिर मायूस होकर, उसकी महफ़िल से उठा,
मुझको मेरी बेबसी ने ,   फिर रुलाया और कुछ  !

इसको भोलापन कहूं या, उसकी होशियारी कहूं?
मैंने पूछा और कुछ,   उसने बताया और कुछ  !

सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
मुझको वादे कुछ मिले थे,   मैंने पाया और कुछ !

आज तो  'आनंद' के,    नग्मों की रंगत और है ,
आज दिल उसका किसी ने फिर दुखाया और कुछ

              आनंद द्विवेदी  १०/०५/२०११

26 टिप्‍पणियां:

  1. सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
    मुझको वादे कुछ मिले थे, मैंने पाया और कुछ !
    .....sach jindagi mein har kisi ko ek jaisa naseeb nahi milta..
    bahut badiya...

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  2. अपने विद्यालय से तो, पढ़कर मैं आया और कुछ ,
    जिंदगी जब भी मिली, उसने सिखाया और कुछ!bilkul sahi jindgi har pal kuch naya hi sikhati hai... bhut hi acchi gajal hai...

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  3. आदरणीय आनंद द्विवेदी जी
    नमस्कार !
    अपने विद्यालय से तो, पढ़कर मैं आया और कुछ ,
    जिंदगी जब भी मिली, उसने सिखाया और कुछ!
    बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने
    .........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

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  4. सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,...
    जितनी भी बातें ज़िन्दगी में बताई जाती हैं , वह हुबहू वही हो मुमकिन नहीं , जैसे प्यार के बदले प्यार ! ज़िन्दगी वह नहीं होती जो कही जाती है... एक ही कदम के अलग अलग अनुभव हाथ आते हैं

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  5. अपने विद्यालय से तो, पढ़कर मैं आया और कुछ ,
    जिंदगी जब भी मिली, उसने सिखाया और कुछ!
    यही क्रम है ...

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  6. आज फिर मायूस होकर, उसकी महफ़िल से उठा,
    मुझको मेरी बेबसी ने , फिर रुलाया और कुछ !

    इसको भोलापन कहूं या, उसकी होशियारी कहूं?
    मैंने पूछा और कुछ, उसने बताया और कुछ !
    Kya khoob likhte hain aap!!

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  7. शख्त पेशोपेश में हूँ क्या करूं, क्या न करूं ,
    साथ लेकर कुछ चला था, काम आया और कुछ !...aesa hi hota hai anand ji..akshar sochi hui zhiz kaam nhi aati hai...

    इसको भोलापन कहूं या, उसकी होशियारी कहूं?
    मैंने पूछा और कुछ, उसने बताया और कुछ !kehte hai ki jhuth tab jhuth nhi lagta jab usme thodi si mashumiyat or bahut jayda bholapan bhada ho...or kabhi kabhi hoshiyari se kisi baat ka koi or jabab de dena bhi padta hai....

    सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
    मुझको वादे कुछ मिले थे, मैंने पाया और कुछ !
    ...sabr ka fal hamesha mitha hota hai...maine bhi aaj tak suna hi hai...par yakin maniye jab fal sabr ke baad milta hain to uski mithash sehad se bhi jyada mithi hoti hai...ye bhi maine suna hi hai....aapki kabita bhut achhi lagi or dol ko chhu gai...

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  8. सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
    मुझको वादे कुछ मिले थे, मैंने पाया और कुछ !

    सही कहा है ..वक़्त की नजाकत को समझना आवश्यक है ...!

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  9. बहुत सही बात कहती हुई रचना ..
    बढ़िया लिखा है .

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  10. सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
    मुझको वादे कुछ मिले थे, मैंने पाया और कुछ !.............sarvmaanya satya likha hai aapne..........thanks.

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  11. सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
    मुझको वादे कुछ मिले थे, मैंने पाया और कुछ !
    ,ekdum anubhoot satya likha hai aapne..........thanks.

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  12. आज फिर मायूस होकर, उसकी महफ़िल से उठा,
    मुझको मेरी बेबसी ने , फिर रुलाया और कुछ !

    हर पंक्ति अपने आप में बेहतरीन ... ।

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  13. बहुत दिनों बाद फिर से ब्लॉग की दुनियां में लौट आया और पहली ही नजर में आपका ब्लॉग पाया | अच्छी पोस्ट के लिए धन्यवाद | मेरे ब्लॉग पे आकर कृपया मेरा उत्साह बढ़ाएं |

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  14. बेहतरीन गज़ल्…………शानदार्।
    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (12-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  15. इसको भोलापन कहूं या, उसकी होशियारी कहूं?
    मैंने पूछा और कुछ, उसने बताया और कुछ !
    सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
    मुझको वादे कुछ मिले थे, मैंने पाया और कुछ !

    जिन्दगी हर मोड़ पर रंगीन होती जायेगी
    दूसरों को छोड़ कर अपनी तरफ रुख कीजिये..!!

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  16. सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
    मुझको वादे कुछ मिले थे, मैंने पाया और कुछ !
    bahut khoobsurat pangtiyan.......

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  17. आनंद जी ,

    बहुत खूबसूरत गज़ल हुई है

    शख्त पेशोपेश में हूँ क्या करूं, क्या न करूं ,
    साथ लेकर कुछ चला था, काम आया और कुछ !

    यही तो ज़िंदगी है ...

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  18. कहने आपके , सुन्दर प्रश्तुती

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  19. इस और कुछ ने बहुत कुछ कह दिया

    खूबसूरत गज़ल

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  20. अपने विद्यालय से तो, पढ़कर मैं आया और कुछ ,
    जिंदगी जब भी मिली, उसने सिखाया और कुछ!

    वाह बहुत खूबसूरत अंदाज़.....
    सादर....

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  21. इसको भोलापन कहूं या, उसकी होशियारी कहूं?
    मैंने पूछा और कुछ, उसने बताया और कुछ ...

    ना होशियारी ना भोलापन ... ये तो उनकी अदा है ... बहुत ही लाजवाब शेर हैं इस ग़ज़ल में ...

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  22. मुझको पहली बार अपनी मौत, तब अच्छी लगी,
    उसने जब अर्थी मेरी, आकर सजाया और कुछ !

    ...लाज़वाब गज़ल..हरेक शेर कुछ कहता है...

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  23. aadarniy sir
    aapne jivan ke har rang ko badi hi sahjta ke saath panno par utaara haiis gazl ke jariye---

    सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
    मुझको वादे कुछ मिले थे, मैंने पाया और कुछ !
    bilkul sateek aur saty vachan.
    sir mujhe to aapke blog ki sabse upar ki likhi panktiyo ne bahut hi prabhavit kiya hai .inko padhakar vastav me ek nai urja ka sanchaar hota hai .
    hardik naman
    poonam

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  24. सब्र का फल हर समय मीठा ही हो, मुमकिन नहीं,
    मुझको वादे कुछ मिले थे, मैंने पाया और कुछ !

    अच्छा लिखते हैं आप आनंद जी.

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  25. "सख्त पेशोपेश में हूँ क्या करूँ क्या न करूँ

    साथ लेकर कुछ चला था , काम आया और कुछ "

    ..........................................खूबसूरत शेर

    ..........................................उम्दा ग़ज़ल

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