गुरुवार, 25 अगस्त 2011

समंदर उबल ना जाये कहीं ...







फिर एक शाम उदासी में ढल न जाये कहीं |
आ भी जाओ ये हसीं वक्त टल न जाए कहीं

रोक रक्खा है भड़कने से दिल के शोलों को
मेरे दिल में जो बसा है वो, जल न जाये कहीं |

नज़र में ख्वाब पले हैं, औ नींद गायब है ,
आँखों-आँखों तमाम शब, निकल न जाये कहीं |

उन्हें ये जिद कि वो मौजों के साथ खेलेंगे,
मुझे ये डर कि समंदर, उबल न जाये कहीं |

आपकी बज़्म में आते हुए डर जाता हूँ,
हमारे प्यार का किस्सा उछल न जाये कहीं |

जानेजां शोखियाँ नज़रों से लुटाओ ऐसी,
रिंद का रिंद रहे वो संभल न जाये कहीं |

रुखसती के वो सभी पल नज़र में कौंध गये,
अबके बिछुड़े तो मेरा दम निकल न जाए कहीं |

रूह से मिल गया ' आनंद ' जब से ऐ यारों
लोग कहते हैं ये इन्सां बदल न जाये कहीं |

- आनंद द्विवेदी १३-०८-२०११

12 टिप्‍पणियां:

  1. नज़र में ख्वाब पले हैं, औ नींद गायब है ,
    आँखों-आँखों तमाम शब, निकल न जाये कहीं |

    उन्हें ये जिद कि वो मौजों के साथ खेलेंगे,
    मुझे ये डर कि समंदर, उबल न जाये कहीं |

    बहुत खूबसूरत गज़ल ...

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  2. यूँ न देखो कि मेरा दिल मचल न जाए कहीं
    ये गर्म राख शरारों में ढल न जाये कहीं |
    उन्हें ये जिद कि वो मौजों के साथ खेलेंगे,
    मुझे ये डर कि समंदर, उबल न जाये कहीं |रुखसती के वो सभी पल नज़र में कौंध गये,
    अबके बिछुड़े तो मेरा दम निकल न जाए कहीं |

    वाह बेहतरीन अल्फ़ाज़्……………।शानदार गज़ल्।

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  3. उन्हें ये जिद कि वो मौजों के साथ खेलेंगे,
    मुझे ये डर कि समंदर, उबल न जाये कहीं |

    आपकी बज़्म में आते हुए डर जाता हूँ,
    हमारे प्यार का किस्सा उछल न जाये कहीं |
    Wah! Kya baat hai!

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  4. उन्हें ये जिद कि वो मौजों के साथ खेलेंगे,
    मुझे ये डर कि समंदर, उबल न जाये कहीं...
    खूबसूरत ग़ज़ल !

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  5. उन्हें ये जिद कि वो मौजों के साथ खेलेंगे,
    मुझे ये डर कि समंदर, उबल न जाये कहीं |

    आपकी बज़्म में आते हुए डर जाता हूँ,
    हमारे प्यार का किस्सा उछल न जाये कहीं |

    वाह ...बहुत खूब कहा है आपने ।

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  6. उन्हें ये जिद कि वो मौजों के साथ खेलेंगे,
    मुझे ये डर कि समंदर, उबल न जाये कहीं...बहुत खूबसूरत शानदार गज़ल .....बधाई..

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  7. बेहतरीन .........
    आपकी बज़्म में आते हुए डर जाता हूँ,
    हमारे प्यार का किस्सा उछल न जाये कहीं |


    रुखसती के वो सभी पल नज़र में कौंध गये,
    अबके बिछुड़े तो मेरा दम निकल न जाए कहीं |

    यह दो शेर कुछ ज्यादा पसंद आये ,मुझे

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  8. "आपकी बज़्म में आते हुए डर जाता हूँ,
    हमारे प्यार का किस्सा उछल न जाये कहीं |"

    "रूह से मिल गया'आनंद'जब से ऐ यारों
    लोग कहते हैं ये इन्सां बदल न जाये कहीं |"


    किसी की रूह से मिलना हो या खुद की
    इन्सां का बदलना तो वाजिब है....

    लाजवाब.....!!

    ***punam***
    bas yun...hi..

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  9. वाह...वाह.....
    इस बार तो काफी गर्मागर्म ग़ज़ल पेश की है आनंद जी ....
    हम तो किनारे से होकर गुजर लिए ....
    बड़ी तेज आंच है .....
    :))

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