बुधवार, 20 मई 2026

नटिनी खेल करेगी रे

सुख दुःख से उबरेगी रे 

तब रंगत निखरेगी रे 


दुलहन नैहर आई तो है 

कितने दिन ठहरेगी रे


पिय की भुवनमोहिनी चितवन 

दिल में कब उतरेगी रे 


छह रूपों वाली इक सौतन 

घर से कब निकरेगी रे 


सबसे दिल की कह देने की 

आदत कब सुधरेगी रे 


मतलब के हर रिश्ते वाली 

दुनिया कब बिसरेगी रे 


सारे दाँव लगे हैं जिस पर 

काया यहीं जरेगी रे 


ये आनंद नहीं, नाटक है 

नटिनी खेल करेगी रे 


सब छूटेगा, जिस दिन डोली

पिय के घर उतरेगी रे ।।


© आनंद द्विवेदी 

रविवार, 15 फ़रवरी 2026

कहीं और चला जा

 

मत कर नया समर, तू कहीं और चला जा

अब छोड़ ये डगर तू कहीं और चला जा।


जो ज़ख़्म पे मरहम हो, शफ़ा हो शुकून हो 

ये वो नहीं है घर, तू कहीं और चला जा।


खुदगर्ज़ बस्तियों में फ़रेबों के मकाँ हैं 

'उनका' है ये शहर तू कहीं और चला जा।


सबसे बड़ा फ़रेब है ख़ुद ज़िंदगी यहाँ 

फिर भी ग़िला न कर, तू कहीं और चला जा।


उनका हुआ तो उनका ही हो जा रे आदमी 

मत कर इधर उधर, तू कहीं और चला जा।


ये ख़्वाब-ओ-हक़ीकत, ये फ़साने, ये फ़लसफे 

अब यार बस भी कर, तू कहीं और चला जा।


आराम भी, सुकून भी, इज़्ज़त भी, इश्क़ भी 

इतना न तंग कर, तू कहीं और चला जा।


'आनंद' का कुछ हाल तो मालूम ही होगा 

न ज़र न घर न दर, तू कहीं और चला जा।




©आनंद

15 फरवरी 2026.

एक बेटा उदास है
कि उसकी माँ
हो गयी है जोगन
कि उसने कह दिया है कि वह अब संसार के बंधनों से मुक्त है
कि साक्षात शिव ने वर लिया है उसे
मगर बेटा फिर भी उदास है
महाकाल के क्रोध से नहीं भयभीत बालक
उसे इतना तो पता है कि हाथी का ना सही
किसी न किसी जीव का सर
तो मिल ही जायेगा उसके धड़ के लिए
वो उदास है कि कहीं शिव के प्रेम में जोगन बनी माँ
ये भूल ही न जाए
कि अपने बच्चे के लिए उसकी एक जिद
कितनी जरूरी है
बच्चे के जीवन के लिए !
__________________ (हैप्पी बर्थडे मम्मा )

शुक्रवार, 27 मई 2022

खुशियों..!

खुशियों अबकी घर आना तो साथ बहाने मत लाना
थोड़ा सा मरहम ले आना, जख़्म पुराने मत लाना

चश्मा, चप्पल, फ़ोन, चार्जर और दवाई रख लेना
सिगरेट की डिब्बी ले आना, मीठे दाने मत लाना

मेमोरी  में   भरवा  लेना  गीत  पुराने  'सत्तर'  के
'गिरिजा' की ठुमरी ले आना, ताजे गाने मत लाना

बिना सूद के मिल जाएं तो थोड़े पैसे ले आना
अपना मिले उसी से लेना, सबके ताने मत लाना

साँझ भये छत पर टहलेंगे, बात करेंगे, रोयेंगे
अबकी बार ठहर कर जाना, पाँव फिराने मत आना

साथ न लेकर आना कोई झंझट इश्क़ मुहब्बत का 
कड़वा सच ले आना लेकिन ख़्वाब सुहाने मत लाना

मत कोई उम्मीदें लाना उनसे दिक्कत बढ़ती है
सब 'आनंद' लुटा जाना अब नए फ़साने मत लाना ।

© आनंद 

मंगलवार, 10 मई 2022

जिंदगी

रंग क्या-क्या दिखाती रही उम्र भर
जिंदगी कुछ सिखाती रही उम्र भर 

एक मिसरा ग़ज़ल का नहीं बन सकी
जाने क्या बुदबुदाती रही उम्र भर 

जिस जगह से मैं भागा उसी बिंदु पर
मुझको लेकर के आती रही उम्र भर 

इश्क़ की राह को मन मचलता कभी 
मुझको रोटी पे लाती रही उम्र भर 

मेरे माथे पे संघर्ष गोदवा दिया
फिर मुझे आजमाती रही उम्र भर 

जख़्म रिसते रहे दर्द बहता रहा
जिंदगी छटपटाती रही उम्र भर 

मैं बुरा था बुरा ही रहा हर कदम
ये हक़ीकत छिपाती रही उम्र भर 

एक टुकड़ा खुशी का नहीं दे सकी
बस पहाड़े पढ़ाती रही उम्र भर

नाम 'आनंद' था सो मेरे नाम की
रोज खिल्ली उड़ाती रही उम्र भर। 

© आनंद

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

होली और फाग

फाग
--------
कल से कुछ साथी बार बार इस फाग का जिक्र कर रहे हैं लगभग 25 वर्ष हो गए इसको पूरे मनोयोग से गाये हुए अब सब भूल गया हूँ फिर भी कोशिश करता हूँ अपनी प्राचीन श्रुति परंपरा को.. 

मन बसै म्वार वृंदावन मा
मन बसै म्वार वृंदावन मा । 

वृंदावन बेली चंप-चमेली
गुलदाउदी गुलाबन मा
गेंदा गुलमेंहदी गुलाबास
गुलखैरा फूल हजारन मा
कदली कदंब अमरूद तूत
फूले रसाल सब शाखन मा
भँवरा गुलज़ार विहार करैं
रस लेहैं भला रस लेहैं
रस लेहैं फूल फल पातन मा।
मन बसै म्वार वृंदावन मा। 

वृंदावन के बन बागन मा
लटकैं झटकैं फल लागत 
दाक छुहारन मा
फूली फुलवारी लौंग सुपारी
व्यापारी व्यापारन मा
मालिन के लड़के तोड़ें तड़के
बेचैं हाट बजारन मा
सौदा करले ओ सुमुखि सुंदरी
जउन होय जाके मन मा।
मन बसै म्वार वृंदावन मा।


बहै पवन मंद शीतल सुगंध
सुख देत सदा सबके मन मा
इत रंग रंगीली औ छोकरा
पिचकारी हनै पिचकारन मा
उत खेलत फाग मदनमोहन
मुरली ध्वनि उठत मृदंगन मा
ऐसे घनश्याम भयो बृज मा
होरी ख्यालैं भला होरी ख्यालैं
होरी ख्यालैं श्याम जब कुंजन मा
मन बसै म्वार वृंदावन मा। 

मोहि नीका भला मोहि नीका
मोहि नीका न लागै गोकुल मा
मन बसै म्वार वृंदावन मा।

बुधवार, 19 जनवरी 2022

हारे ही क्यों

जो कुछ था सब हारे ही क्यों 
उसकी राह निहारे ही क्यों 

ठौर न कोई और मिला क्या
उसके गाँव दुआरे ही क्यों 

जब हिस्से का दो ग़ज तय था
ज्यादा पाँव पसारे ही क्यों 

मन के जख़्म कौन भर देगा
सबसे बदन उघारे ही क्यों 

जब नदिया जल भर बहती थी
बैठे रहे किनारे ही क्यों 

आई याद, दर्द होगा ही
कितना रहो बिसारे ही क्यों 

ओ 'आनंद' पूछ तो उससे
यह सब साथ हमारे ही क्यों 

© आनंद
















सोमवार, 27 दिसंबर 2021

इक न इक दिन..

इत्र बनेंगे  उड़ जाएंगे  इक न इक दिन
ऐसे रुख़सत हो जाएंगे इक न इक दिन

लिए पोटली खट्टी मीठी यादों की
उनकी गलियों में जाएंगे इक न इक दिन

पत्थर, मोम, फूल या काँटे, सब उनके
ऐसे मन को बहलायेंगे इक न इक दिन

यही सोचकर सपने देख रहा था मैं
शायद वो इनमें आएंगे इक न इक दिन

हमने कोशिश की थी उन सा होने की
वो किस्सा भी बतलायेंगे इक न इक दिन

उन्हें पता है, हमसे और न कुछ होगा
रो धो कर चुप हो जाएंगे इक न इक दिन

मैं तो ख़ैर बज़्म से उनकी उठ आया
अलबत्ता वह पछताएंगे इक न इक दिन

मेले का 'आनंद' झमेले का जीवन
मेले में ही खो जाएंगे इक न इक दिन

@ आनंद




शनिवार, 7 अगस्त 2021

जिसने थोड़ा थोड़ा करके..

जिसने थोड़ा थोड़ा करके मुझको इतना किया खराब
कहता रहा उसे ही अबतक दुनिया में सबसे नायाब 

जिसनें देखा नहीं पलटकर मेरी दुनिया कैसी है
उसके ही दर रहे पहुँचते अक़्सर मेरे पगले ख़्वाब 

याद किया जब पिछली बातें, दोनों ही झूठे निकले
उसने मुझको कहा ज़िंदगी मैंने उसको कहा शराब 

'मछला रानी' जैसा जादू, कुछ उसने कर रक्खा था
'पिंजरे का तोता' होकर भी ख़ुद को समझा किये नवाब 

आख़िर को यह बहती किश्ती अपने ही तट लगनी है
लहरें चाहे कुछ भी कर लें,  कितनी पैदा हों गिर्दाब 

शांत हो गयी महफ़िल सारी, नग़्मे, किस्से, शिक़वे, शोर
धीरे-धीरे लौट रहे हैं, अपने-अपने घर अहबाब 

छोड़ो भी 'आनंद',  मियाँ अब क्या रक्खा इन बातों में 
किससे कितने काँटे पाये, किसने कितने दिए ग़ुलाब। 

© आनंद 
गिर्दाब  = भँवर
अहबाब = मित्र









शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

सावन का झूला...

ऐसा नहीं है की सावन का झूला केवल लड़कियों को ही आकर्षित करता हो ... मुझे ठीक से याद है मेरा पहला झूला अन्दर वाली कोठरी के दरवाजे पर सांकल चढ़ाने वाली कुण्डी में पड़ा था ...बैठने की जगह पर आधी आधी तकिया दोनों तरफ लटकाई गयी थी अगले एक दो सालों में वो घर की धन्नियों से होता हुआ मुख्यद्वार तक पहुंचा और बैठने के लिये तकिया का स्थान पेढई (पाटा जिस पर बैठकर खाना खाया जाता था) ने ले लिया था ... फिर लोहारन के दरवाजे वाली नीम में पड़ने वाला पटरा ... किसकी पेंगे कितनी दूर तक जाती हैं, कौन नीम की पत्ती छूकर आता है.... झूला रुकते ही उसपर चढ़ने की मारामारी... सावन के अंतिम दिनों में तो बाकायदा नंबर लगता था ..........कितने प्रकार के गीत गए जाते थे जब महिलाओं का समय झूलने का रहता था तब, अपनी छत से ही नीम की पत्तियों का लहरा-लहरा के नाचना देखकर समझ लेते थे की झूला चल रहा है ..... कभी कभी झूले की रस्सी या झूला टूट भी जाता था ...ऐसे में जिनके हाथ में रस्सा होता था वही बचते थे बाकी सारे बदाबद गिरते भी थे ... जब गाँव से कस्बे में रहने लगा ... तो भी झूला नियमित पड़ता रहा मोहल्ले में ... बस यहीं दिल्ली में आकर ही सब छूट गया मगर छूटकर भी सारा कुछ जीवित है अन्दर ... बस आंख सी भर आती है कभी कभी। पार्क के झूले मुझे आकर्षित नहीं करते वो मुझे शहरी जीवन के प्रोटोकॉल जैसे लगते हैं।


फ़ुर्सत नहीं मिली

गीत कोई गाने की फ़ुर्सत नही मिली
मन को बहलाने की फ़ुर्सत नहीं मिली
हसरत से हर रंग ख़्वाब का देखा है
रंग में रंग जाने की फ़ुर्सत नहीं मिली
बहुत दूर थी मंज़िल सर पर बोझा था
ज्यादा सुस्ताने की फ़ुर्सत नहीं मिली
दुनिया को क्या मतलब समझे दर्द मेरा
मुझको समझाने की फ़ुर्सत नहीं मिली
कुछ अशआर मुहब्बत के थोड़ी नज़्में
शायर बन जाने की फुर्सत नहीं मिली
मरहम की उम्मीद बँधाकर चोट मिली
चोटें सहलाने की फ़ुर्सत नहीं मिली
घुटी हुई चीख़ों पर किसका ध्यान गया
ज्यादा चिल्लाने की फ़ुर्सत नहीं मिली
दिल में कुछ तस्वीरें हैं कुछ किस्से हैं
जिनको दफ़नाने की फ़ुर्सत नहीं मिली
नाम मिला 'आनंद', मगर आनंद कहाँ
ख़ुद से मिल पाने की फ़ुर्सत नहीं मिली
© आनंद

रविवार, 12 जुलाई 2020

जहाँ पे जख़्म है

जहाँ पे जख़्म है मरहम वहीं लगाये मुझे
जिसे ये इल्म हो अपना वही बताये मुझे

तमाम उम्र हमारी जलन से वाक़िफ़ हो
उसी को हक़ मिले कि घाट पर जलाये मुझे

हर एक जख़्म के बदले यहाँ दुआएं हैं
कोई भी जख़्म नया दे के आजमाए मुझे

अभी भी इश्क़ की बातों पे यकीं है मुझको
वो कहानी कोई तफ़्सील से सुनाये मुझे

मुझे तो डूबने वाले भी तैरते ही मिले
है इल्तज़ा कि कोई डूबना सिखाये मुझे

कभी बजा न सका 'नाम' के नगाड़े को
जिसे भुलाना है कल आज ही भुलाये मुझे

जहाँ मैं नेकियों को डालता था वो दरिया
किसी ने पाट दिया है बिना बताये मुझे

बना बना के मिटाता रहा जो तस्वीरें
अगर वो खेल चुका हो तो अब मिटाये मुझे

किसी के नाम से 'आनंद' नहीं हो जाता
जिंदगी ख़ाब दिखाने से बाज आये मुझे।

© आनंद



शुक्रवार, 5 जून 2020

लाउडस्पीकर की याद

उधर गैस (पेट्रोमैक्स) जलाने की तैयारियाँ जोरों पर थीं, जैसे जैसे शाम गिरने लगी थी माहौल में गहमागहमी बढ़ती जा रही थी, गैसों में मेन्टल बाँधे जा रहे थे हवा भरी जा रही थी, जल चुकी गैसों को यथा स्थान टाँगा जा रहा था, दुआरे एक हल उल्टा गाड़ दिया गया था जिस पर एक बड़ी वाली हंडा गैस टंग चुकी थी, उधर घर के लंबे-चौड़े आँगन के एक कोने में जमीन ढलवाँ लंबा खोदकर गुइल (सामूहिक चूल्हा) बनाई गई थी जिसके मुख पर सूरज की किरणों की डिजाइन में ईंट रखकर उसे बीच बीच में गीली मिट्टी से भरकर स्थायित्व और आँच नियंत्रित रखने का इंतजाम किया गया था उसी से सटकर पानी भरे लोटे के ऊपर चावल से भरी कटोरी रखी हुई थी जिस पर कड़वे तेल से भरा एक दीपक जल रहा था, चावल के साथ एक दस रुपये का नोट भी रखा हुआ था, बगल में जमीन में चार-पाँच अगरबत्तियां जल रहीं थी। गुइल के साथ ही लगभग आधे आँगन को कवर करते हुए एक बड़ी सी जाजिम बिछी हुई थी जिसपर महिलाओं का झुन्ड गीत गाते हुए पूरियाँ बेलने में लगा था जाजिम के किनारे किनारे पाँच छह लोग आँटा सानने में लगे थे इनमें एक दो युवा और लड़के भी थे जो नज़र बचा कर बार बार औरतों के बीच में बैठी लड़कियों को देख रहे थे।सफेद धोती पहने कमर में लाल अंगौछा कसे एक सज्जन पूरियाँ निकालने में तल्लीन थे, औरतें एक एक कर के बेली हुई पूरियाँ कड़ाही के पास जाजिम पर बिछे दूसरे कपड़े पर उछाल रहीं थी जिन्हें कढ़ाही के दूसरी तरफ बैठे दूसरे सज्जन उठा उठाकर फुर्ती से कढ़ाही में डाल रहे थे। जस्ते के विशाल और बंद भगोने में सब्जी रखी हुई थी, बनी हुई पूड़ियाँ लकड़ी के एक दूसरे बड़े झौव्वा में सलीके से लगायी जा रहीं थीं ताकि परोसे जाने तक गरम बनी रहें, माहौल में एक अव्यक्त उत्साह और उत्तेजना व्याप्त थी, बाहर घर मुहल्ले और रिश्तेदारों के बच्चे बाजा वाले के पास भीड़ लगाए हुए थे बाजे वाला मशीन का हैंडल जोर जोर से घुमाता है तावा (रिकॉर्ड) तेजी से नाचने लगता है वह हैंडल उठाकर उसकी सुई को तावा के किनारे रख देता है हवा में एक आरती बजने लगती है, पहला गाना अनिवार्य रूप से धार्मिक बजाना है यह नियम बाजा वाले को अच्छी तरह से मालूम है।
इन सबसे दूर गाँव के एक घर में छत पर लेटा एक और लड़का अपनी माँ से पूछता है
"अम्मा तेवारी खियाँ ते खाय क बोलौव्वा आवा कि नहीं?"
"अबै नहीं"
"अबै कहौ फलदनहै न आए हुऐं" अम्मा जबाब देती हैं ।
लड़का अपना ध्यान लाउडस्पीकर की आवाज़ पर केंद्रित किये हुए है जिसकी आवाज़ हवा के रुख से कभी धीमी तो कभी तेज़ सुनायी दे रही है उसमें इस समय तीसरा गाना बज रहा है
"ये गोटेदार लहँगा निकलूँ जब डाल के, ... छुरियाँ चल जाएँ मेरी मतवाली चाल पे"

ये मई और जून के महीने भी क्या होते थे तब पुदीनहरा की गोली और न्योते का कार्ड, बप्पा के कुर्ते की जेब में ये दो चीजें पड़ी ही रहती थीं। किसी किसी दिन तो गाँव में एक साथ कई कई लाउडस्पीकर बजते थे अलग अलग दिशाओं में, एक तरफ़ से 'बहिरे बाबा' की आवाज़ आती तो दूसरी तरफ से नौटंकी 'सुल्ताना डाकू' की, हवा के झोंको के साथ तीसरी तरफ से सुनाई पड़ता "झुलनी का रंग साँचा हमार पिया"।
सपन हो गईं वो सब बातें आंखों के आगे देखते ही देखते। दुनिया को इतनी भी तेजी से नहीं बदलना था।

©आनंद

सोमवार, 9 मार्च 2020

Corona कोरोना वाली होली

कोरोना का रोना
ऊधौ कोरोना का रोना
इत से निकरी सुघर गोपिका उत से गोप सलोना
इतने में मोबाइल बज गयो फैला है कोरोना
खुद का मुँह छूने को रोकै कहै हाथ खुब धोना
ऊधौ कोरोना का रोना

गोप कहै सुनु सुमुखि सुलोचनि हमरी बात सुनो ना
ढेर न छेड़ूँगा मैं गोरी इक किस्सू दे दो ना
रोग दोख का डर सारो इस पिचकारी से धोना
ऊधौ कोरोना का रोना

इत फागुन का रंग चढ़ रह्यो उधर रोग का रोना
गोपी बरजै सुनो साँवरे हमको आज छुओ ना
सुना नहीं सरकार कह रही गज़ भर दूर रहो ना
ऊधौ कोरोना का रोना

© आनंद

रविवार, 1 मार्च 2020

शहर में चाँदमारी

हवा में गंध तारी हो गयी है
शहर में चाँदमारी हो गयी है

यही बोया था हमने जो उगा है ?
ये कैसी काश्तकारी हो गयी है

लहू को देख, खुश होने लगे हैं
ये क्या आदत हमारी हो गयी है

वो इन्सां था कि प्यादा, मर गया है
मगर कुर्सी खिलाड़ी हो गयी है

संपोले दूध पीकर डस रहे हैं
सियासत को बीमारी हो गयी है

गज़ब जस्टिफिकेशन हो रहे है
जुबाँ सब की कटारी हो गयी है

है अगला कौन सा घर कौन सा सर
अभी मर्दनशुमारी हो गयी है

यहाँ से देश की क्या राह होगी
हमारी जिम्मेदारी हो गयी है

अभी 'आनंद' का मौसम नहीं है
ख़ुशी पर रंज भारी हो गयी है ।

© आनंद










गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

दंगे

अज़ब जद्दोजहद में जी रहे हैं
फटे हैं जिस्म, झण्डे सी रहे हैं

हमारा कान कौव्वा ले गया है
हमारे दोस्त दुःख में जी रहे हैं

अचानक देशप्रेमी बढ़ गए हैं
कुएँ में भाँग है सब पी रहे हैं

ये साज़िश और नफ़रत का जहर है
जिसे अमृत समझकर पी रहे हैं

हमारी चेतना शायद मरी है
हज़ारो साल कठपुतली रहे हैं

हमें क्यों दर्द हो इन मामलों से
कि हम विज्ञापनों में जी रहे हैं

ये फर्ज़ी मीडिया का दौर है जी
गलत को देखकर लब सी रहे हैं

अकेले हैं तो है 'आनंद' वरना
हुए जब भीड़ नरभक्षी रहे हैं ।

© आनंद

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

डर लगता है

'टुकड़े-टुकड़े' नारों वालों, मॉबलिचिंग के पैरोकारों
मुझको दोनों के नारों से डर लगता डर लगता है

जिसको मौका मिला उसी ने जमकर अपना नाम कमाया
झूठै ओढ़ा झूठ बिछाया, झूठै खर्चा झूठ बचाया
अब ऐसे ठेकेदारों से डर लगता है डर लगता है

मुझको तेरा भय दिखलाकर तुमको मेरा भय दिखलाया
थी जो मेड़, बन गयी खाई फिर पक्की दीवार बनाया
हमे तुम्हारे तुम्हें हमारे व्यवहारों से डर लगता है

कपटसंधियाँ करने वाले जनगणमन का गान कर रहे
षडयंत्रो की रचना वाले संविधान का नाम जप रहे
मुझको इन रचनाकारों से डर लगता है डर लगता है !!

© आनंद

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

उम्मीद

काटोगे तो कट जायेगी
ये बदरी भी छँट जायेगी

बच्चे आपस में झगड़े तो
माँ की छाती फट जायेगी

नफ़रत की चट्टान अगर है
जोर लगाओ हट जायेगी

आओ मन का मैल मिटाएँ
आधी बात निपट जायेगी

दोनों के दिल साफ रहे तो
यह खाई भी पट जाएगी

अच्छा सोचो अच्छा बोलो
सब कड़वाहट मिट जायेगी

बाँटो कुछ 'आनंद', ज़िंदगी
आख़िर तो मरघट जायेगी।

© आनंद



शनिवार, 18 जनवरी 2020

जो होता है होने दो

जिसकी चादर दाग़दार है उसको अपनी धोने दो
कब तक सर पटकोगे बाबा जो होता है होने दो

हिंसा आगजनी धरनों या लिचिंग फिचिंग पर बोले तो
आँखों में खटकोगे बाबा, जो होता है होने दो

नेता अफ़सर संघी वामी सभी देश के सेवक हैं
कहाँ कहाँ अटकोगे बाबा जो होता है होने दो

सबकी आदत पड़ जाती है सबको जीना पड़ता है
तुम कब तक मटकोगे बाबा जो होता है होने दो

इसके भाषण उसकी गाली, उसकी गुण्डागर्दी पर
तुम भी सर झटकोगे बाबा, जो होता है होने दो

दूर दूर से ट्वीट करोगे चिंता में घुल जाओगे
पास नहीं फटकोगे बाबा, जो होता है होने दो

जीवन का 'आनंद' ढूँढते सत्ता के संघर्षों में
तुम उल्टा लटकोगे बाबा जो होता है होने दो ।

© आनंद

सोमवार, 6 जनवरी 2020

कहीं कुछ ठहरा है

सहरा में है शहर, शहर में सहरा है
भाग-दौड़ के बीच कहीं कुछ ठहरा है

इश्क़ निठल्लों के बस का है खेल नहीं
किस्सागोई नहीं, रोग ये गहरा है

वो आँखों ही आँखों में कुछ बोले हैं
उनकी भाषा है और मेरा ककहरा है

एक बार हमने भी पीकर देखा था
वर्षों गुज़रे नशा अभी तक ठहरा है

हम भी वैसे हैं जैसी ये दुनिया है
मुझ पर शायद रंग अधिक ही गहरा है

कुछ दस्तूर ज़माने के जस के तस हैं
मोहरें लुटती हैं, कोयले पर पहरा है

सब अपने हैं साहब किसको क्या बोलें
ये 'आनंद' समझिये, गूँगा बहरा है।

© आनंद