मंगलवार, 10 मई 2022

जिंदगी

रंग क्या-क्या दिखाती रही उम्र भर
जिंदगी कुछ सिखाती रही उम्र भर 

एक मिसरा ग़ज़ल का नहीं बन सकी
जाने क्या बुदबुदाती रही उम्र भर 

जिस जगह से मैं भागा उसी बिंदु पर
मुझको लेकर के आती रही उम्र भर 

इश्क़ की राह को मन मचलता कभी 
मुझको रोटी पे लाती रही उम्र भर 

मेरे माथे पे संघर्ष गोदवा दिया
फिर मुझे आजमाती रही उम्र भर 

जख़्म रिसते रहे दर्द बहता रहा
जिंदगी छटपटाती रही उम्र भर 

मैं बुरा था बुरा ही रहा हर कदम
ये हक़ीकत छिपाती रही उम्र भर 

एक टुकड़ा खुशी का नहीं दे सकी
बस पहाड़े पढ़ाती रही उम्र भर

नाम 'आनंद' था सो मेरे नाम की
रोज खिल्ली उड़ाती रही उम्र भर। 

© आनंद

शुक्रवार, 18 मार्च 2022

होली और फाग

फाग
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कल से कुछ साथी बार बार इस फाग का जिक्र कर रहे हैं लगभग 25 वर्ष हो गए इसको पूरे मनोयोग से गाये हुए अब सब भूल गया हूँ फिर भी कोशिश करता हूँ अपनी प्राचीन श्रुति परंपरा को.. 

मन बसै म्वार वृंदावन मा
मन बसै म्वार वृंदावन मा । 

वृंदावन बेली चंप-चमेली
गुलदाउदी गुलाबन मा
गेंदा गुलमेंहदी गुलाबास
गुलखैरा फूल हजारन मा
कदली कदंब अमरूद तूत
फूले रसाल सब शाखन मा
भँवरा गुलज़ार विहार करैं
रस लेहैं भला रस लेहैं
रस लेहैं फूल फल पातन मा।
मन बसै म्वार वृंदावन मा। 

वृंदावन के बन बागन मा
लटकैं झटकैं फल लागत 
दाक छुहारन मा
फूली फुलवारी लौंग सुपारी
व्यापारी व्यापारन मा
मालिन के लड़के तोड़ें तड़के
बेचैं हाट बजारन मा
सौदा करले ओ सुमुखि सुंदरी
जउन होय जाके मन मा।
मन बसै म्वार वृंदावन मा।


बहै पवन मंद शीतल सुगंध
सुख देत सदा सबके मन मा
इत रंग रंगीली औ छोकरा
पिचकारी हनै पिचकारन मा
उत खेलत फाग मदनमोहन
मुरली ध्वनि उठत मृदंगन मा
ऐसे घनश्याम भयो बृज मा
होरी ख्यालैं भला होरी ख्यालैं
होरी ख्यालैं श्याम जब कुंजन मा
मन बसै म्वार वृंदावन मा। 

मोहि नीका भला मोहि नीका
मोहि नीका न लागै गोकुल मा
मन बसै म्वार वृंदावन मा।

बुधवार, 19 जनवरी 2022

हारे ही क्यों

जो कुछ था सब हारे ही क्यों 
उसकी राह निहारे ही क्यों 

ठौर न कोई और मिला क्या
उसके गाँव दुआरे ही क्यों 

जब हिस्से का दो ग़ज तय था
ज्यादा पाँव पसारे ही क्यों 

मन के जख़्म कौन भर देगा
सबसे बदन उघारे ही क्यों 

जब नदिया जल भर बहती थी
बैठे रहे किनारे ही क्यों 

आई याद, दर्द होगा ही
कितना रहो बिसारे ही क्यों 

ओ 'आनंद' पूँछ तो उससे
यह सब साथ हमारे ही क्यों 

© आनंद
















सोमवार, 27 दिसंबर 2021

इक न इक दिन..

इत्र बनेंगे  उड़ जाएंगे  इक न इक दिन
ऐसे रुख़सत हो जाएंगे इक न इक दिन

लिए पोटली खट्टी मीठी यादों की
उनकी गलियों में जाएंगे इक न इक दिन

पत्थर, मोम, फूल या काँटे, सब उनके
ऐसे मन को बहलायेंगे इक न इक दिन

यही सोचकर सपने देख रहा था मैं
शायद वो इनमें आएंगे इक न इक दिन

हमने कोशिश की थी उन सा होने की
वो किस्सा भी बतलायेंगे इक न इक दिन

उन्हें पता है, हमसे और न कुछ होगा
रो धो कर चुप हो जाएंगे इक न इक दिन

मैं तो ख़ैर बज़्म से उनकी उठ आया
अलबत्ता वह पछताएंगे इक न इक दिन

मेले का 'आनंद' झमेले का जीवन
मेले में ही खो जाएंगे इक न इक दिन

@ आनंद




शनिवार, 7 अगस्त 2021

जिसने थोड़ा थोड़ा करके..

जिसने थोड़ा थोड़ा करके मुझको इतना किया खराब
कहता रहा उसे ही अबतक दुनिया में सबसे नायाब 

जिसनें देखा नहीं पलटकर मेरी दुनिया कैसी है
उसके ही दर रहे पहुँचते अक़्सर मेरे पगले ख़्वाब 

याद किया जब पिछली बातें, दोनों ही झूठे निकले
उसने मुझको कहा ज़िंदगी मैंने उसको कहा शराब 

'मछला रानी' जैसा जादू, कुछ उसने कर रक्खा था
'पिंजरे का तोता' होकर भी ख़ुद को समझा किये नवाब 

आख़िर को यह बहती किश्ती अपने ही तट लगनी है
लहरें चाहे कुछ भी कर लें,  कितनी पैदा हों गिर्दाब 

शांत हो गयी महफ़िल सारी, नग़्मे, किस्से, शिक़वे, शोर
धीरे-धीरे लौट रहे हैं, अपने-अपने घर अहबाब 

छोड़ो भी 'आनंद',  मियाँ अब क्या रक्खा इन बातों में 
किससे कितने काँटे पाये, किसने कितने दिए ग़ुलाब। 

© आनंद 
गिर्दाब  = भँवर
अहबाब = मित्र