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बुधवार, 13 मार्च 2019

बट्टा खाता

(१)

बचपन की हर जगह पर
हर राह
हर गली, नुक्कड़, नहर की पुलिया
बाज़ार
हर जगह ठिठकी खड़ी होती है एक याद
और लोग कहते हैं कि
दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है !

(२)

यूँ तो सब भागदौड़ में शामिल हैं
पर
सबसे ज्यादा जल्दी है
गाँवों को
शहर बन जाने की !

(३)

बिना जमा निकासी के 'बंद खाते'
जैसी होती हैं यादें
और हम कहते हैं कि
यादें हमारी जमापूँजी हैं
हमने अपनी तमाम पूँजी
बट्टे खाते में डाल दी है !

©आनंद

शनिवार, 22 सितंबर 2018

बीता साल...

कोंछ में जिंदगी के दिन भरकर
धरती ने लगा लिया
इसी दरमियान
सूरज का पूरा एक चक्कर,

जहाँ जहाँ तनिक छाया मिलती
वो दौड़ लगा देती
और जैसे सुस्ताने लगती, पाकर तपती धूप
कई बार मृत्यु अच्छी लगी जिंदगी से
तो कई बार लड़ी जाने वाली जंग ज्यादा भली लगी मृत्यु से

तुम्हारे काजल की स्याही को छाया बना हम
जी गए लंबे लंबे दुःख
दुखों के सफर में
अकेला न होना
सफर खत्म होते होते आखिर हो ही जाता है
सुखों का सफर !

आओ साथ मनाएँ
अपने सुखों और दुखों की वर्षगाँठें
कि
ये तुम्हारी ही मुहब्बत थी
जिसकी बदौलत मैं
सलामत बच सका
धरती के इस सालाना जलसे में !

© आनंद

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

अकथ

सुबह उगते हुए सूरज को देखना
देखना ओस की कोई अकेली बूँद
खय्याम की रुबाई से रूबरू होना
या फिर गुनगुनाना मीर की ग़ज़ल
आफिस की मेज़ को बना लेना तबला
और पल भर को  जी लेना बचपन
ऐसा ही कुछ कुछ है तुम्हारा अहसास
जिसे मैं ठीक से कह नहीं पा रहा हूँ 
कभी सुनो मेरे ठहाकों में खुद को
कभी पढ़ो मेरे आँसुओं में अपनी कविता
कि ढूंढो मेरे अंधेरो में अपनी छाया
और लहलहाओ मेरे मौन में बनकर सरगोशियों की फ़सल

युगों से तुम्हें कहने की कोशिश में हूँ
मगर एक भी उपमा नहीं भाती मन को
रह जाते हो तुम हमेशा ही अकथ
जैसे अनकही रह गयी मेरी वेदना
अनलिखी रह गयी मेरी कविता
जैसे अनछुआ रह गया एक फूल
जैसे अनहुआ रह गया कोई प्रेम
कि जैसे अनजिया बीत गया एक जीवन

सुनो !
कहीं तुम भी
किसी का जीवन तो नहीं ?

© आनंद

रविवार, 24 दिसंबर 2017

दिसंबर के ख़्वाब...

(१)

हमें एक सीढ़ी बनानी थी
छत पर धूप में पड़े ख़्वाबों तक पहुँचने और उन्हें सूर्यास्त से पहले ही उतार लेने के लिए,
अम्मा बाबू जी को खत में लिखा करती थीं ये बात.. कि
दिसम्बर के दिनों अगर ख़्वाबों की देखभाल ठीक हो जाये तो बसंत आने पर खिलते हैं उनमें
मनभावन फूल,
मैं अकेले बाँस तो हो सकता था किंतु सीढ़ी नहीं
हमारे भावों की एक सीढ़ी
घर की छत तक तभी पहुँच पायी
जब तुम्हारा समर्पण लग गया उसमें डंडों की तरह,
किसी का ऊपर चढ़ना या नीचे उतरना
हो सकता है एकांतिक यात्रा
किंतु
सीढियाँ हमेशा प्रतीक हैं साथ की सहचर की !

मेरी सहचरी !
तुम्हें बसंत ऋतु की हार्दिक शुभकामनाएँ !

(२)

दिसंबर के किसी ख़्वाब में घुसती हुई
नवंबर की याद और जनवरी की कल्पना को... अब
डपट देता हूँ मैं
पूस माघ वाले समय में ऐसा नहीं कर पाता मैं
तब उतरते अगहन में फागुन की कल्पना और तैयारी
दोनों सहज स्वीकार्य थीं
अंग्रेजों के आदर्श जीवन ने तो हमारे फागुन से भी फगुनहट छीन ली,
इस दिसंबर मैंने भी कोई ग्लोबल सपना नहीं देखा
न धरती को सुंदर बनाने का
न ही सुख और समृद्धि का
बस खोया रहा तुम्हारी कजरारी आँखों की शर्मीली मुस्कान में
सुना है इस बार फागुन और बसंत ने हाथ मिला लिया है
मार्च की बजट समीक्षाओं के खिलाफ़,

सुनो
इस बार फागुन का हर रंग जी लेना
और जी लेना इस साल की बसंत बहार !

© आनंद

रविवार, 29 अक्टूबर 2017

इश्क़ की राह

मेरी ज़िद
तुम्हारे झुमके में फँसा
चुनरी का वो हिस्सा है
जिसे तुम बड़े एहतियात से छुड़ाती हो,
उस घड़ी
खीझ और धैर्य का 'प्रयाग' होता है
तुम्हारा चेहरा

तुम्हारा उलाहना
मेरी कलम का खो गया वो कैप है
जिसके बिना
खतरे में है उसका अस्तित्व
कितना भी अच्छा लिखने के बावजूद,
उस घड़ी
इश्क़ की इबारत होता है
तुम्हारा उलाहना

मेरी जिद और तुम्हारे उलाहने
दोनों से
दो कोस और रह जाता है इश्क़
जब कभी खुले बाल लेकर तुम तय करती हो
ये दो कोस की दूरी
चंपा के फूल सी महक़ उठती हैं
इश्क़ की गलियाँ !
और दुआओं सा झरता है प्यार
हमारे जीवन की देहरी पर !!

ऐ सुनो न..
क्या मैं भी इस जनम में
ये दो कोस चल पाउँगा कभी ?

© आनंद

बुधवार, 27 सितंबर 2017

प्रेम के रंग

सबसे खूबसूरत होता है ये संसार
जब डूबा होता है प्रेम के रंगों में
उदात्त और उत्कृष्ट होता जाता है ,
हर रंग कुछ और निखरता जाता है
जब घुलता है नेह के साथ समर्पण भी.

अधिकार सबसे बड़ा शत्रु है
जो न जाने कब
संवेदनाओं में छुपकर सेंध लगा लेता
दिल की दुनिया में.

अधिकार से उपजी अपेक्षाएँ
अपेक्षाओं से जन्मी नादानियों में
माफ नहीं किये जाते प्रेमी
न ही खुद के और न ही प्रेम के द्वारा

सायास चुप्पियां,
बेवजह की व्यस्तता,
नपा-तुला जवाब..कितना कुछ होता है ऐसा
जो बता देता है कि सफल हुआ शत्रु का वार
प्रेम पर विजयी हुआ अधिकार

नियत है फिर छटपटाहट
ये सजा भी है और सीख भी
कि प्रेम में उतार वाली सीढ़ियों पर
बढ़ाया गया कदम होती है अपेक्षाएँ

सुनो भोलेराम !
प्रेम में लापरवाही से मत चलाना
रंग भरी एक भी कूची
समर्पण को ही रखना सर्वोच्च
भावों के पुष्प चुनने में रखना खास ख़्याल
कि उनके रंग और महक़ से प्रीतम को होती रहे
साफ, ताजी और खुली हवा का अहसास !

© आनंद

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

गालों का गुलाल

एक दिन जब
मुस्कराता हुआ ईश्वर
मेरी रूह पर वैधानिक चेतावनी सा
गोद रहा था ..प्रेम
मैं उसके हाथ से फिसल कर गिरा तुम्हारी मुंडेर पर
जहाँ तुमने धूप में डाल रखे थे अपने सतरंगी सपने
खुश्बुओं के परिंदों के लिए बिखेरे हुए थे
खिलखिलाहटों के दाने
उड़ते हुए दुपट्टे पर तैर रही थी
खुशियों और शैतानियों की जुगलबंदियाँ
तुम्हारी पलकों की गीली कोरों पर फँसी एक नन्ही बूँद
मेरी राह में आकर बोली
ऐ मुसाफ़िर... मैं ही हूँ तुम्हारी मंजिल
और आहिस्ता आहिस्ता नसों में उतर गया
तुम्हारे सुर्ख़ गालों का सारा ग़ुलाल
फिर एक दिन मैंने देखा
रुमाल में टँके गुलाब के नीचे अपने नाम का पहला अक्षर!

ओ मेरी जिंदगी
ले चल मुझे वहीं, जहाँ तूने कभी बो दिए थे
रेशमी बटुए से निकाल कर अपने अरमान
इससे पहले कि निर्मोही समय
हाथ छुड़ाकर निकलने की कोशिश करे
मुझे लौटानी हैं, किसी की उम्र भर की अमानतें
किताबों के बीच छुपाये गए बेशकीमती अहसास
आँखों मे कुछ चुलबुले ख़्वाब
और ढेर सारी नादानियों और शोखियों से भरी उसकी तमाम तस्वीरें ।

चल जल्दी चल
कि हमें रोपने हैं अभी भरोसे के कई पौधे 
और चहचहाते पंछियों से लेनी हैं
ढेर सारी दुआएँ !!

© आनंद

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

नशेड़ी आँखें


इन दिनों
नशेड़ी सपनों का
अड्डा हो गयी हैं
चश्मे के पीछे डरी हुई दुबकी रहने वाली मेरी आँखें,
उम्र
समाज
धर्म और कर्तव्य जैसे
कई नशामुक्ति केंद्रों का चक्कर काटने के बाद
अंततः मैंने रख दिया है इन्हें
तुम्हारी राहों पर
तुम्हारी हर आहट पर झूमने के लिए स्वतंत्र ।

© आनंद

सोमवार, 18 सितंबर 2017

पहला क़दम

याद है वो दिन ?
जब तुम पहली बार आयीं थीं
मेरे दिल की दहलीज पर
जरा सा खोलकर दरवाजे का पल्ला
झाँकी भर थीं
और बाकी बनी रही थीं चौखट के बाहर ही

जितनी अंदर आयीं वो भी प्रेम नहीं..प्रश्न लेकर
जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हो
कि क्या यही है वो दर
जहाँ मुझे हमेशा से होना चाहिए था?
जैसे पूछना चाह रही हो
कि क्या यही है वो शख्स
जिसे बरसों पहले से मेरा होना चाहिए था?

संयोग था या नियति
या फिर मिल गया था
आसरा तुम्हारे सवालों को,
ठिकाना तुम्हारी तलाश को

न जाने कैसे और कब
चौखट से बाहर ठहरे तुम्हारे हिस्से ने
तुमसे ही बगावत कर दी
जिसमें शामिल था तुम्हारा दिल भी
और बढ़ा दिया था तुमने अपना पहला कदम
मेरे मन के वीरान आँगन में

अब जबकि
मेरे सीने के सफेद बाल
मुनादी कर रहे हैं मेरे परिपक्व प्रेम की
तुम कह देती हो अक्सर
'टीनएज हो गए हो तुम बिल्कुल'

सुनो !
मत बोला करो न ऐसे
एकदम लजा जाता हूँ मैं

क्या करूँ मैं
जो अब भी
सूना रहता है मेरा संसार
तुम्हारी पायल के संगीत बिना
खुशियां रहती हैं अधूरी
तुम्हारी मुस्कान के गीत बिना

तुम नहीं होतीं तो सब कुछ रहता है आस-पास ज्यों के त्यों
केवल मैं ही नहीं रह पाता
कहीं भी चैन से !

© आनंद

शनिवार, 16 सितंबर 2017

भूख

सूरज साँझ की मुनादी कर आगे बढ़ गया
घोसलों की ओर उड़ चले पंक्षी
रसोई के धुएँ से लाल हो उठी आँखें लिए
चौखट से बाहर निहारती है एक स्त्री
जिंदगी का बोझ और फावड़ा
बाहर रख देता है पति
चौके में पाटे पर बैठा है अभावग्रस्त प्रेम
होरी और धनिया
अब नहीं बनते किसी कहानी के पात्र

देह
रोग से भरी है
देश तरक्की से
और प्रेम भरा है सूफ़ियाने से
भूख के लिए नहीं है कोई जगह
प्रेम में भी !

© आनंद

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

डगर पनघट की


जो खुशी में खुलकर नाच न सके
दुःख में न बहा सके ज़ार ज़ार आँसू
किसी के कष्ट में
तकलीफ से तड़प न उठे
होगा कोई संत,परमहंस
दुनिया के किस काम का

प्रियतम से नज़रें मिलने के बाद भी
जिसके दिल की गति रहे सामान्य
होठों पर न मचले आह,
न ही नाचे वाह
बेसुध होकर कर न बैठे कुछ का कुछ
होगा कोई विश्वजीत,इंद्रियजीत नरेश
प्रेम के किस काम का

नीर भरी झिलमिलाती आँखों से
एकटक
प्रियतम की तस्वीर को पहरों निहारना
उसे देखकर हँसना, रोना,गाना
ध्यान की कक्षा का पहला पाठ है
और उससे बातें...
मौन से संवाद का प्रवेशद्वार !

प्रेम में नहीं हुआ जा सकता
किस्मत को कोसते हुए
थके कदम लेकर
या कि हानि लाभ का विचार करते हुए
नपे तुले सधे कदम लिए
कोई ज्ञानी ध्यानी बनकर

विवेक और विचार के लिए
सारी दुनिया पड़ी है जान!
अर्थशास्त्र
समाजशास्त्र
और नीतिशास्त्र की,
प्रेम तो एक छलाँग है मीत
जिसने लगा दिया
वही पा सका खुद को
जैसे मैं पा लेता हूँ
तुम्हारी मदिर उन्मीलित आँखों में
अपना सच्चा ठिकाना
अपना अस्तित्व

सुनो !
तुम्हारे होने से
अब जरा भी कठिन नहीं है
डगर पनघट की !

© आनंद

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

सुकून


तकली की तरह नाचती जिंदगी में
गट्ठर भर कपास लिए
दूर बैठा है ईश्वर
इधर हलक में अटकी हुई है मेरी जान
ईश्वर और जोर से नचाता है तकली
मेरी नज़र बस धागे पर है
कच्चे सूत सा हमारा प्रेम
अब एक लापरवाह ईश्वर के हाथों में है
पर सुकून ये है कि
ईश्वर और मेरे इस लफड़े में
इस बार
मेरे साथ हो... 
तुम !

© आनंद

रविवार, 10 सितंबर 2017

इश्क़

वो किसी फ़क़ीर की दुआ सा होता है
ठिठुरन भरी सर्दी में अलाव की आँच सा..
इतना ताक़त से लबरेज़
कि उसी से क़ोकहन अपनी शीरी के लिए काट देता है पहाड़
और मुलायम इतना
कि जैसे हवा में उड़ता हुआ कपास का फूल,

कन्नौज के इत्र की खुशबू सा अहसास लिए
वह
दबे पाँव उतरता है एक एक सीढ़ी
पहले आँखों में एक ख़्वाब की तरह
फिर सारे जिस्म में माँ के दूध की तरह
जाँ में उतरता है वो महबूब का तसव्वुर बनकर
और फिर रूह में वंशी की तान की तरह

देखते ही देखते
बदल जाती है ये समूची दुनिया
इश्क़ मुकम्मल कर देता है इंसान को
वो वह नहीं रह जाता
जो वो पहले था ।

बहुत नर्म मिज़ाज़
सलीकेदार,
राह चलते खुशियाँ बाँटने वाला
ख़ुशबू छलकाता हुआ, बेवजह डबडबाई आँखों वाला,
ऐसा कोई शख्स कभी मिले
तो जान लेना उसे प्रेम में
और करना उसके महबूब के लिए
ढेर सारी दुआएँ !

ये दुआ किसी किसी को नसीब होती है
ये ख़ुशबू एक खास इत्र में ही होती है
जिसे चुनता है ईश्वर स्वयं !

© आनंद

रविवार, 3 सितंबर 2017

मेरे अपने

वाह भाई वाह,
ऐसे कैसे कह दूँ कि कोई नहीं है मेरा
भगवान ने दो हाथ पैर दिए हैं
वो भी सलामत,
एक पूरी दुनिया है
(वो दीगर बात है कि बिना तुम्हारे ये दुनिया बेकार लगे...पर है तो)
रिश्ते नाते हैं
(वो दीगर बात है कि बिना तुम्हारे सारे नाते केवल माँग और पूर्ति के नियम की श्रंखला भर हैं... पर हैं तो)
ख़्वाब हैं
(वो बात दीगर है कि तुम्हें पास से छूकर देखने का पहला ख़्वाब आज तक अधूरा है...पर है तो)
आँखें हैं
(वो बात दीगर है कि आँखें खुशियों के नन्हे जुगुनू समेटने की जगह खारे पानी का बेमतलब झरना भर हैं... पर हैं तो)
आँसुओं से अच्छा याद आया
अपने तो सिर्फ़ आँसू हैं,
उतना ही तुम्हें देखकर छलकते हैं 
जितना न देखकर
राम जाने कैसे रह लेते हैं
ग़म और ख़ुशी दोनों के एक से वफ़ादार
काश मैं इनसे सीख पाता कोई सबक ...

काश आँसुओं से भरी अपनी आँखें
मैं
चूम पाता एक बार !

© आनंद

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

अवसाद -2

मैं अपने अँधेरों को घसीटकर प्रकाश में नहीं ले जाना चाहता,
न ही चाहता हूँ अपने तिमिर पर किसी भी प्रकार के उजाले का अवांछित हमला
मैंने नीम अँधेरे में फैलाया है अपना हाथ
किसी साथ के लिये
प्रकाश के लिए नहीं...

मेरे भीरु सपने
घबराते हैं चकाचौंध से
इतना,  कि
जितना घबराता होगा गर्भस्थ भ्रूण
अजन्मी मृत्यु से,
मेरे लिए सुरक्षित आश्रय था तुम्हारा प्रेम
जहाँ मैं साँझ ढले कभी भी रुक सकता था
किंतु एक दिन जब मैं बहुत थका था और हारा भी
उस दिन शाम ढली ही नहीं
तुम ने चुन लिया था प्रकाश को
निरापद,
आश्रित प्रेम किसे भाता भला

प्रकाश एक कर्म है
सूरज का उदय- अस्त होना
चंद्रमा का भी,
दीप जलाना अथवा कोई और जतन करना उजाले की
सबका सब है एक यत्न एक दौड़,
और अँधेरा... वो तो है... बस है
सायास प्रकाश है
अनायास अँधेरा है,
तुम्हारे प्रकाश वरण के बाद...
एक दिन मैंने भी मना कर दिया और दौड़ने से
अब मैं
अँधेरे के खिलाफ़ 
दुनिया के किसी भी षड़यंत्र का हिस्सा नहीं हूँ
और मेरी दुनिया में नही है
प्रकाश का कोई भी हिस्सा ।

© आनंद

अवसाद

अवसाद
――――
मुस्कराती तस्वीरों के पीछे छिपी
गहन पीड़ा सा मैं
बार बार खटखटाता हूँ
किसी अदृश्य मृत्यु का द्वार
निष्फल प्रयत्नों का लेखा जोखा इकट्ठा कर रहा है जीवन,
दुनिया तंज़ करती है ...'बस्स' ?
मेरे मुँह से निकलती है बस एक 'आआह्'...

अब दुनिया शिकारी है 
जीवन एक जंगल
जहाँ केवल ताकतवर को ही होती है
जीने की अनुमति,
मृत्यु अब मीडिया की तरह है
शिकारी शिकार करते हुए करेगा
मनोरंजन के अधिकार का उपयोग !
जंगल में मृत्यु केवल एक 'क्षण' है
घटना नहीं,
जंगल में नहीं मिलते किसी क्षण के पाँवों के निशान।

ऐसे में
केवल 'तुम' मुझे बचा सकती हो
पर तुम
कहीं नही हो !

© आनंद

बुधवार, 14 जून 2017

मिलन के छंदमुक्त छंद

मिलन के छंदमुक्त छंद

तुम आ गए हो, नूर आ गया है...

नूर का तो नहीं पता पर तुम एकदम सही वक्त पर आए हो
उम्मीद की लौ बस अभी अभी बुझी भर थी कि तुमने आकर कह दिया 'धीरज नहीं है तुमको'
इस बात पर झगड़ा हो सकता है कि तुमने मेरे धीरज का पैमाना इतना बड़ा और बढ़ा कर क्यों रखा है
पर इस बात को तो तुम भी मानती हो कि मेरे जीवन में ऋतुएँ तुम्हारे आने और जाने से ही बदलती हैं,
जब तुमने कहा कि 'मुझे लगा था कि तुम अब बड़े हो गए हो पर नहीं तुम एकदम बच्चे हो'
उसी समय मैंने कायनात को शुक्रिया कहा
मुझे इस तरह से देखने के लिए,

पता है कल तुमने मुझे अनगिनत बार 'पागल' कहा और मैं उतनी ही बार इतराया खुद पर,
मुझे इस तरह की खुशी से नवाज़ने के लिए शुक्रिया ,
शुक्रिया इस चादर को अपनी पसंद के हर रंग से रंगने के लिए,
मुझे न ये खुशी क़ैद करनी है, न ये पल और न ही ये ख़ुश्बू,
सब जिस कायनात का हिस्सा हैं उसी को अर्पित,

कोई एक पल भी मेरे साथ रह लेता है न... जोकि असल में वो तुम्हारे साथ ही रहता है क्योंकि मेरा मुझमें है ही क्या बाहर भीतर हर जगह तो तुम ही मिलती हो उसे...
वो फिर बड़ी दूर तक महक़ता हुआ जाता है प्रेम की खुशबू से,

सुनो!
फिर देखो एक बार ठीक से
पागल कौन है
मैं या तुम ... ।

- आनंद

मंगलवार, 13 जून 2017

शब्दों से भय ...

मैं कुछ लिखने के लिए कलम उठाता हूँ
फिर रख देता हूँ
ये सोचकर कि
शब्द मौन की हत्या है
मैं मृत्यु से भयभीत नहीं हूँ
डरता हूँ प्रेम के अनुवाद से
दर्द का एक ही मतलब है दर्द
उसकी व्याख्या करना छल है प्रेम से,

प्रेम का जिक्र करना
उस लाक्षागृह में आग लगा देना है
जिसमें धोखे से ठहराए गए हैं कुछ सपने
मैं आग से भयभीत नहीं हूँ
डरता हूँ सपनों की मासूमियत से
मेरा मौन लाक्षागृह की सुरंग है

शायद बच निकलें कुछ सपने
शब्दों की दहकती आग से

'भरोसा' सबसे बड़ा धोखेबाज शब्द है ।

 - आंनद

बुधवार, 22 मार्च 2017

तुम्हारा साथ

'और तुम्हारा साथ...? '

मैं प्रतीक्षा को समय से मापता हूँ
और समय को जीवन से
जीवन को मापता हूँ तुम्हारे साथ से
और तुम्हारा साथ ... ?
छोड़ो
मैं फिर से प्रतीक्षा पर लौटता हूँ  !

मैं दुख को देह से मापता हूँ
और देह को आयु से
आयु को मापता हूँ तुम्हारे साथ से
और  तुम्हारा साथ...?
छोड़ो
मैं फिर से दुख पर लौटता हूँ

मैं मृत्यु को शान्ति से मापता हूँ
और शान्ति को प्रेम से
प्रेम को मापता हूँ  तुम्हारे साथ से
और तुम्हारा साथ...  ?
छोड़ो
मैं फिर से मृत्यु पर लौटता हूँ !

- आनंद

रविवार, 25 सितंबर 2016

लौटती राहों का स्वप्न

मेरी वजह से
कितने बुरे होते जा रहे हो तुम
सब ख़त्म कर दोगे न ?
मिटा दोगे अपने पाँव के निशाँ
शायद राह भी ...

मगर मेरी आँखों से निकलती है एक नदी
उसी से आऊंगा मैं तुम्हारे पास
तैरना नहीं जानता 'तुम्हारी तरह'
घाट की थाह भी नहीं
डूबना नियति है
केवल समय नहीं है नियत

पर अपने हजारों डरो के बावजूद
मैं आऊंगा एक दिन
और देखूँगा अपनी आँखों से
कैसे अपने बन जाते हैं पराये 
देखूँगा तुम्हें
जैसे मोर देखता है घन को
चकोर देखता है चन्दा को
और अगर तुमने जुल्म की इंतेहाँ ही कर दी
तो फिर...
विअसे ही देख लूँगा
जैसे चोर देखता है किसी राजकोष को
पर मैं आऊंगा जरूर
क्योंकि खुछ घटनाओं का घाट जाना ही  
अच्छा होता है मृत्यु से पूर्व,

कमरे के बिस्तर पर मरने से 
लाख गुना अच्छा है 
राहों पर चलते हुए मरना
और अगर वो राहें तुम्हारी हों
तो फिर क्या कहने ...!

- आनंद