शुक्रवार, 5 जून 2020

लाउडस्पीकर की याद

उधर गैस (पेट्रोमैक्स) जलाने की तैयारियाँ जोरों पर थीं, जैसे जैसे शाम गिरने लगी थी माहौल में गहमागहमी बढ़ती जा रही थी, गैसों में मेन्टल बाँधे जा रहे थे हवा भरी जा रही थी, जल चुकी गैसों को यथा स्थान टाँगा जा रहा था, दुआरे एक हल उल्टा गाड़ दिया गया था जिस पर एक बड़ी वाली हंडा गैस टंग चुकी थी, उधर घर के लंबे-चौड़े आँगन के एक कोने में जमीन ढलवाँ लंबा खोदकर गुइल (सामूहिक चूल्हा) बनाई गई थी जिसके मुख पर सूरज की किरणों की डिजाइन में ईंट रखकर उसे बीच बीच में गीली मिट्टी से भरकर स्थायित्व और आँच नियंत्रित रखने का इंतजाम किया गया था उसी से सटकर पानी भरे लोटे के ऊपर चावल से भरी कटोरी रखी हुई थी जिस पर कड़वे तेल से भरा एक दीपक जल रहा था, चावल के साथ एक दस रुपये का नोट भी रखा हुआ था, बगल में जमीन में चार-पाँच अगरबत्तियां जल रहीं थी। गुइल के साथ ही लगभग आधे आँगन को कवर करते हुए एक बड़ी सी जाजिम बिछी हुई थी जिसपर महिलाओं का झुन्ड गीत गाते हुए पूरियाँ बेलने में लगा था जाजिम के किनारे किनारे पाँच छह लोग आँटा सानने में लगे थे इनमें एक दो युवा और लड़के भी थे जो नज़र बचा कर बार बार औरतों के बीच में बैठी लड़कियों को देख रहे थे।सफेद धोती पहने कमर में लाल अंगौछा कसे एक सज्जन पूरियाँ निकालने में तल्लीन थे, औरतें एक एक कर के बेली हुई पूरियाँ कड़ाही के पास जाजिम पर बिछे दूसरे कपड़े पर उछाल रहीं थी जिन्हें कढ़ाही के दूसरी तरफ बैठे दूसरे सज्जन उठा उठाकर फुर्ती से कढ़ाही में डाल रहे थे। जस्ते के विशाल और बंद भगोने में सब्जी रखी हुई थी, बनी हुई पूड़ियाँ लकड़ी के एक दूसरे बड़े झौव्वा में सलीके से लगायी जा रहीं थीं ताकि परोसे जाने तक गरम बनी रहें, माहौल में एक अव्यक्त उत्साह और उत्तेजना व्याप्त थी, बाहर घर मुहल्ले और रिश्तेदारों के बच्चे बाजा वाले के पास भीड़ लगाए हुए थे बाजे वाला मशीन का हैंडल जोर जोर से घुमाता है तावा (रिकॉर्ड) तेजी से नाचने लगता है वह हैंडल उठाकर उसकी सुई को तावा के किनारे रख देता है हवा में एक आरती बजने लगती है, पहला गाना अनिवार्य रूप से धार्मिक बजाना है यह नियम बाजा वाले को अच्छी तरह से मालूम है।
इन सबसे दूर गाँव के एक घर में छत पर लेटा एक और लड़का अपनी माँ से पूछता है
"अम्मा तेवारी खियाँ ते खाय क बोलौव्वा आवा कि नहीं?"
"अबै नहीं"
"अबै कहौ फलदनहै न आए हुऐं" अम्मा जबाब देती हैं ।
लड़का अपना ध्यान लाउडस्पीकर की आवाज़ पर केंद्रित किये हुए है जिसकी आवाज़ हवा के रुख से कभी धीमी तो कभी तेज़ सुनायी दे रही है उसमें इस समय तीसरा गाना बज रहा है
"ये गोटेदार लहँगा निकलूँ जब डाल के, ... छुरियाँ चल जाएँ मेरी मतवाली चाल पे"

ये मई और जून के महीने भी क्या होते थे तब पुदीनहरा की गोली और न्योते का कार्ड, बप्पा के कुर्ते की जेब में ये दो चीजें पड़ी ही रहती थीं। किसी किसी दिन तो गाँव में एक साथ कई कई लाउडस्पीकर बजते थे अलग अलग दिशाओं में, एक तरफ़ से 'बहिरे बाबा' की आवाज़ आती तो दूसरी तरफ से नौटंकी 'सुल्ताना डाकू' की, हवा के झोंको के साथ तीसरी तरफ से सुनाई पड़ता "झुलनी का रंग साँचा हमार पिया"।
सपन हो गईं वो सब बातें आंखों के आगे देखते ही देखते। दुनिया को इतनी भी तेजी से नहीं बदलना था।

©आनंद

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