रविवार, 20 जनवरी 2013

अब न यारी रही न यार रहा ...

न तमाशा रहा न प्यार रहा
अब न यारी रही न यार रहा

मेरे अशआर भला क्या कहते   
न शिकायत न ऐतबार रहा

मैंने उससे भी सजाएं पायीं
जो ज़माने का गुनहगार रहा

जिक्र फ़ुर्सत का यूँ किया उसने
सारे हफ़्ते ही इत्तवार रहा

खुशबुएँ बेंचने लगे हैं गुल
इस दफ़े अच्छा कारोबार रहा

आज से मैं भी तमाशाई हूँ
आजतक मुद्दई शुमार रहा

ये बुलंदी छुई सियासत ने 
चोर के हाथ कोषागार रहा

दर्द का सब हिसाब चुकता है
सिर्फ़ 'आनंद' का उधार रहा

- आनंद 

2 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द का सब हिसाब चुकता है..
    सिर्फ 'आनंद'का उधार रहा....!!

    बहुत खूब...!

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  2. खुशबुएँ बेचने वाले ही तो आज कल सबकी पहली पसंद बने हुए हैं

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