सोमवार, 9 सितंबर 2013

आँखों में एक किर्च सी अक्सर गड़ी रही

आँखों में एक किर्च सी अक्सर गड़ी रही
ख्वाबों से हकीक़त ही  हमेशा  बड़ी रही

मैं मौत से भी अपने तजुर्बे न कह सका
लछमन की तरह सर की तरफ वो खड़ी रही

इस जिंदगी ने इतना तवज्जो दिया मुझे
हरदम मेरे सुकून के पीछे पड़ी रही

आज़ाद इश्क़ ने तो मुझे भी किया मियाँ  
पर रूह मिरी क़ैद की खातिर अड़ी रही

अगले जनम में देखने की बात हुई है
'आनंद' तुझे बेवजह जल्दी बड़ी रही

- आनंद



गुरुवार, 5 सितंबर 2013

बेवकूफ़




(एक)

तुमसे आगे नहीं बढ़ पाई
न मेरी कविता
न मैं,
हाँ बढ़ गया वक़्त
एक दिन
धीरे से कान में कहता हुआ
'बेवकूफ़'...
मैंने चौंककर खुद को देखा
मुस्कराया
आश्वस्त हुआ
कि आख़िरी वक़्त में कुछ तो रहेगा
पहचान के लिए
तुम न सही
तुमसे मिला कोई नाम ही सही  !

(दो)

मुझे शांति चाहिए
बेशक उसका नाम मृत्यु हो
तुम्हें संघर्ष चाहिए
बेशक उसका नाम जीवन हो
तुम मुझे भगोड़ा कहते हो
और मैं तुम्हें 'लालसी'
दोनों
जितना सही हैं
उतना ही गलत
तुमसे विछोह
शांति के बाद का संघर्ष है
तुम्हारा साथ
संघर्ष के बाद की शांति है
जीवन के लिए दोनों जरूरी हैं
ठीक हम दोनों के साथ की तरह !

- आनंद

बुधवार, 28 अगस्त 2013

कृष्णा …. माधवा !




कृष्णा …. माधवा !
चराचर नायक ….
देख रहे हो न अपनी लीला भूमि को
देख रहे होगे जरूर … धर्म के क्षत्रपों को
और शासकों को भी
योगियों के मन में भोग की आतुरता भी
और आमजन की निरीहता भी
सुनी ही होगी दामिनी की आर्त पुकार
आखिर अपनी कृष्णा की भी तो सुनी थी आपने
अपनों की तो सभी सुन लेते हैं
आपतो अहेतुकी कृपा करने वाले
जीव मात्र पर करुणा  रखने वाले परम कृपालु हैं
भारत वर्ष को किस पाप का दंड मिल रहा है प्रभु !
हे कण कण में व्याप्त मेरे कान्हा
ये वक्त मुरली की तान का है या कि सुदर्शन चक्र का …?
आज सांकेतिक नहीं ….
सच में आ जाओ भक्तवत्सल
अवतरित हो जाओ हम चलती फिरती लाशों में
ताकि हर किशोर, तरुण, आबालवृद्ध
उठा ले चक्र
आज बहुत जरूरत है एक महासमर की
निष्काम कर्म योग भूल गया है यह देश
अब यहाँ भोग को ही
जीवन मान लिया गया है प्रभो
और पतन को ही
उन्नति !!


जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ माधव !
बहुत बक बक करने लगा हूँ न आजकल ?
पर क्या करूँ
अंतर की इस व्यथा को तुमसे न कहूँ
तो किससे कहूँ !!

- आनंद





मंगलवार, 27 अगस्त 2013

गिड़गिड़ाना ...

प्रेम माँगने  से नहीं प्राप्त होता
कहा किसी सक्षम व्यक्ति ने
उसने समझ  लिया होगा प्रेम को
मैं अगर उसकी समझ से चला
तो चला ही जाउँगा  फिर
तुम्हारे देश से.…
जैसे चले जाते हैं प्राण
किसी भी शरीर से,
उसके पास होगी सामर्थ्य
होगा पराक्रम
निर्मित कर लेगा वह अपनी दुनिया स्वयं
जहाँ वह अपनी मर्जी से चुन सके प्रेम
मैं मूरख अगर चुनूँगा  भी
तो आँसू ही चुनूँगा  जन्म जन्म
कितना सहज रिश्ता है हमारा तुम्हारा
रो देना मेरे लिए आम बात है
रुला देना तुम्हारे लिए !

जो कर्ता हैं वह नहीं गिड़गिड़ाते
देख लेते हैं केवल गिड़गिड़ाना
मुस्करा पड़ते हैं मन ही मन
समझकर मोह, भ्रम, बेवकूफ़ी, और कमजोरी किसी की
जो प्रेम में होते हैं
वो नाक रगड़ते हैं दिन रात प्रियतम की एक झलक के लिए
वो कुछ नहीं करते
प्रेम स्वयं फूंक देता है
मान  सम्मान के महल को सबसे पहले,
ह्रदय में जल का सोता फूट पड़ता है
आँखें ख़ुशी पाकर भी बरसती हैं और गम पाकर भी ….

सुनो !
मैं एक ऐसे ही मूरख को जानता हूँ
कभी फुर्सत मिले तो जानने की कोशिश करना
कि कैसा है वह !

- आनंद 

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

बोल देना सच, जहाँ खतरा रहा है

बोल देना सच, जहाँ खतरा रहा है जान को
हम वहीं ले जा रहे हैं आधुनिक इंसान को

दौड़ में आगे निकलने की अजब जद्दोज़हद
दाँव पर रखने लगे हैं बेहिचक सम्मान को

वो ज़माने और थे, जब आदमी की क़द्र थी
बोझ है रख दीजिये अब ताक़ पर ईमान को

कुछ नहीं जोड़ा बुढ़ापे के लिए हमने कभी
बेवजह का दोष क्यों दें हम भला संतान को

रौनकें बिखरी पड़ी हैं हर तरफ बाज़ार में
छटपटा फिर भी रहे हैं लोग इक मुस्कान को

जो सड़क को पार करता है डरा सहमा बहुत
है वही जिसने बचाया  गाँव की पहचान को

माँ नहीं कहती कभी परदेश जाने के लिए
सौंप आती है उन्हें औलाद ही भगवान को

एक कमरा दर्द का है एक में मजबूरियाँ
सोचिये 'आनंद' रखेगा कहाँ मेहमान को

 - आनंद