मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

काला धन


अद्भुत जन गण मन है साहब
पंक्त्तिबद्ध जीवन है साहब

प्यार मुहब्बत, साथ, भरोसा
ये सब सच्चा धन है साहब

जिसने धन को सबकुछ माना
वो एकदम निर्धन है  साहब

औरों का दुःख जिसको छूता
वो मन नील गगन है साहब

बाहर उजली उजली बातें
अंदर भरा व्यसन है साहब

कुर्सी को तुम देश कह रहे
जनता बड़ी मगन है साहब

उम्मीदों  की फ़सल काटना
अपना अपना फ़न है साहब

खोटा है 'आनंद' जगत में
ये भी काला धन है साहब

- आनंद 

रविवार, 25 सितंबर 2016

लौटती राहों का स्वप्न

मेरी वजह से
कितने बुरे होते जा रहे हो तुम
सब ख़त्म कर दोगे न ?
मिटा दोगे अपने पाँव के निशाँ
शायद राह भी ...

मगर मेरी आँखों से निकलती है एक नदी
उसी से आऊंगा मैं तुम्हारे पास
तैरना नहीं जानता 'तुम्हारी तरह'
घाट की थाह भी नहीं
डूबना नियति है
केवल समय नहीं है नियत

पर अपने हजारों डरो के बावजूद
मैं आऊंगा एक दिन
और देखूँगा अपनी आँखों से
कैसे अपने बन जाते हैं पराये 
देखूँगा तुम्हें
जैसे मोर देखता है घन को
चकोर देखता है चन्दा को
और अगर तुमने जुल्म की इंतेहाँ ही कर दी
तो फिर...
विअसे ही देख लूँगा
जैसे चोर देखता है किसी राजकोष को
पर मैं आऊंगा जरूर
क्योंकि खुछ घटनाओं का घाट जाना ही  
अच्छा होता है मृत्यु से पूर्व,

कमरे के बिस्तर पर मरने से 
लाख गुना अच्छा है 
राहों पर चलते हुए मरना
और अगर वो राहें तुम्हारी हों
तो फिर क्या कहने ...!

- आनंद


शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

ग़रीब

ग़रीब
वह होता है
जो ... देता है
रोजगार
योजना बनाने वालों को,

चलाता है
अफ़सर से लेकर चपरासी तक
तनख्वाह से लेकर कमीशन तक
एक पूरी व्यवस्था ,

उद्योगपतियों के चेहरों को देता है मुस्कान
नेताओं को देता है
उनका हिस्सा
संसद को देता है
एक वजह
राजनीति को ... नारे
और
विदेशी बैंकों को धन

ग़रीब
कितना जरूरी है
देश की मुख्यधारा के लिए !

-आनंद 

सोमवार, 29 अगस्त 2016

अपनों से मिला है न ज़माने से मिला है

अपनों से मिला है न ज़माने से मिला है
ये ग़म मुझे उम्मीद लगाने से मिला है

जलने का तज़ुर्बा भी बड़ी चीज़ है यारों
मुझको हवन में हाथ जलाने से मिला है

किसको फ़िकर है दर्द की, सब पूछते हैं ये
किसकी गली से किसके ठिकाने से मिला है

रिसता न गर लहू तो कोई जान न पाता
क्या ज़ख्म लिए कौन ज़माने से मिला है

बौछार दुआओं की रही मुँह के सामने
ये घाव जरा पीठ घुमाने से  मिला है

शिद्दत से पुकारो जिसे वो शख्स बारहा 
मिलने की आरजू ही मिटाने से मिला है

'आनंद' शबे-ग़म से नसीमे-सहर को चल
मौका तुझे ये नींद न आने से मिला है  !

-आनंद 

सोमवार, 30 मई 2016

सुन जीवन !

अलग अलग है तेरी हर इक धुन जीवन
कभी  गौर से तू भी इसको सुन जीवन

कहीं उदासी, ख़ामोशी, कोहराम कहीं
कहीं बज रहा तू रुनझुन-रुनझुन जीवन

दीवारों पर लिखी इबारत भी पढ़ ले
मत बुन अब, झूठे सपने, मत बुन जीवन

किसने तुझको पीर दिया क्या ज़ख़्म दिये
ऐसी बातों को मन में मत गुन जीवन

किसे पुकारे इस बेगानी बस्ती में
पत्थर के  हैं तेरे साजन सुन जीवन

या आनंद खोज ले या दुनिया ले ले
पारस छोड़ कोयले को मत चुन जीवन 

- आनंद