शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

नींद की चिट्ठी

रात नींद ने एक चिट्ठी लिखी
नाम तुम्हारा 
पता मेरा ...

सांसें महक सी गयीं 
होंठ खिल पड़े एक मुद्दत बाद 
वही विश्वाश 
वही अपनापन 
आँखें फिर से शरारती हुईं 
तुम्हारे झूले पर बैठे हम पल भर को 

वही चिड़ियों की चहचहाहट ...
मेंहदी इस बार भी अच्छी चढ़ी है
तुमने उतने ही मन से
मुझे खिलाया अपने हाथ से बना खाना
सच कहता हूँ
मुझे बहुत अच्छा लगा

तुम ख्वाबों में
अब भी
वैसी की वैसी हो ...
________________________


- आनंद 

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

बैरन हो गयी निंदिया ...

रात एक बजे वाली करवट 
बोली नहीं कुछ 
सुलगती रही 
अंदर ही अंदर 
मगर फिर 
डेढ़ बजे वाली ने 
चुपचाप आती जाती साँसों के कान में 
भर दिया न जाने कैसा ज़हर 
अंदर जाती हर साँस ने नाखूनों से 
खरोंचना शुरू कर दिया दिल को 
बाहर आती साँस को हर बार
पीछे से धक्का देना पड़ रहा था

खुली पलकों ने
कातर होकर
बूढ़े बिस्तर के शरीर पर आयी
झुर्रियों को देखा
बिस्तर ने
करवट की ओर देखा
करवट ने घड़ी की ओर
घड़ी ने आसमान की ओर
आसमान ने चाँद की ओर
और
चाँद ...?

बस्स्स्स !


तुम्हारा जिक्र आते ही
मैं नाउम्मीद हो जाता हूँ


हरजाई साँसें
ये सारी बात
नहीं समझती न |
_________________

- आनंद 

सोमवार, 10 सितंबर 2012

बातें है बातों का क्या

तुमने तो कह दिया 
हँस कर 
मुझे 
पागल
माँ की एक बात याद आ रही है 
तभी से 
और 
सोंच रहा हूँ 
काश तुम्हारी जबान पर बैठी होती 
'सरस्वती' |
_________________________





करना चाहता हूँ 
एकदम नई शुरुआत 
पर
हे प्रिय मृत्यु !
तेरे सहयोग के बिना 
यह संभव नहीं |

और हे प्रिय जीवन ! 

खुश हूँ 
बल्कि
साफ कहूँ तो
तूने उम्मीद से ज्यादा निभाया है
काश मैं भी किसी के प्रति
इतनी
वफादारी निभा पाता |

______________________




सर्दियों में
सूरज
बहूऊऊऊउत दूर हो जाता है धरती से
तब कितनी अच्छी लगती है न धूप !
सच्ची बताना
दूर होने
और फिर अच्छा लगने का चलन
भगवान ने ही बनाया है क्या ?

वैसे एक बात बताऊँ
तुम दूर होकर
बहुत बुरे लगते हो
हाँ !
:( :(


- आनंद








रविवार, 9 सितंबर 2012

इसमें क्या दिल टूटने की बात है


इसमें क्या दिल टूटने की बात है
जख्म ही तो प्यार की सौगात है

जिक्र फिर उसका हमारे सामने
फिर हमारे इम्तेहां   की रात  है

दो घड़ी था साथ फिर चलता बना
चाँद  की  भी  दोस्तों सी जात है

साथ  अपने  रास्ते  ही  जायेंगे
सिर्फ़ धोखा मंजिलों की बात है

हैं हकीकत बस यहाँ तन्हाइयाँ
वस्ल तो दो चार दिन की बात है

कौन  कहता  है  कि  राहें बंद हैं
हर कदम पर इक नयी शुरुआत है

मत चलो छाते लगाकर दोस्तों
जिंदगी 'आनंद' की बरसात है |


- आनंद 


शनिवार, 8 सितंबर 2012

फ़ुरसत में आज़ सारे जमाने का शुक्रिया

इस नाज़ुक़ी से मुझको मिटाने का शुक्रिया
क़तरे को  समंदर से  मिलाने  का शुक्रिया  

मेरे सुखन को अपनी महक़ से नवाज़ कर
यूँ आशिक़ी का  फ़र्ज़  निभाने का शुक्रिया 

रह रह  के तेरी खुशबू उमर भर  बनी रही
लोबान  की  तरह से   जलाने का शुक्रिया  

इक भूल  कह  के  भूल ही  जाना कमाल है
दस्तूर-ए-हुश्न   खूब  निभाने  का  शुक्रिया

आहों  में  कोई और हो   राहों  में कोई और
ये साथ  है   तो  साथ में  आने  का शुक्रिया 

दुनिया  भी बाज़-वक्त   बड़े  काम की लगी
फ़ुरसत में  आज  सारे ज़माने  का शुक्रिया

जितने थे  कमासुत  सभी शहरों में  आ गए 
इस  मुल्क  को 'गावों का' बताने का शुक्रिया 

ना  प्यार  न सितम  न  सवालात  न झगड़े 
'आनंद'   बे-वजह जिए जाने   का   शुक्रिया 


- आनंद
०४-०९-२०१२
              -