मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

'वो' नहीं था मैं...



यूँ खुश तो क्या था, मगर गमजदा नहीं था मैं,
तुम मुझे 'जो' समझ रहे थे, 'वो' नहीं था मैं |

मेरी  बर्बाद   दास्ताँ , है  कोई   ख़ास   नहीं,
जब मेरा घर जला, तो आस पास ही था मैं |

चंद  लम्हे, जो  मुझे  जान से  भी  प्यारे  थे,
उनकी कीमत पे मैं बिका,मगर सही था मैं |

दुश्मनो को भी सजा, प्यार की ऐसी न मिले,
मेरी चाहत थी कहीं और,और कहीं था मैं |

तुमने  बेकार   मेरा  क़द  बढा  दिया   इतना,
फलक तो क्या जमीन पर भी कुछ नहीं था मैं |

घर  उदासी  ने  बसाया है, जहां   पर  आकर,
शाम तक उस जगह 'आनंद' था, वहीं था मैं |

      -----आनंद द्विवेदी. २८/१२/२०१०

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

काश तुम होते.....!

आपका साथ,  उम्रभर होता,
कितना फिरदौस ये सफ़र होता !

आपका प्यार जो पाया होता ,
मुझे पहचानता  शहर होता !

तेरे सीने में अगर दिल होता,
मेरी आवाज का असर होता!

आते-जाते नजर मिला करती,
तेरे कूचे में अगर घर होता !

आपकी जुल्फ का हंसी मंज़र ,
काश ये ख्वाब बेनज़र होता !

सोंचता हूँ जो आप न होते,
आज 'आनंद' दर-ब-दर होता !!

   --आनंद द्विवेदी
२७/१२/२०१०

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

खुदा भला करे इनके खरीददारों का

रंग हल्का नही होगा कभी दीवारों का,
उसने ले रखा है ठेका, यहाँ बहारों का !

लोग थकते नही  करते सलाम दरिया को,
हाल पूछेगा कौन ढह रहे किनारों का  !

ईद का चाँद आपको भी नज़र आ जाये,
काम फिर क्या बचेगा, सोंचिये मीनारों का ?

गौर से देखिये हर चीज़ यहाँ बिकती है,
खुदा भला करे, इनके खरीददारों का !

मैंने हर जख्म करीने से सजा रखा है,
दिल भी अहसानफरामोश नही यारों का !

तमाम मुल्क का दुःख दर्द दूर कर देंगे,
चल रहा इन दिनों अनशन 'रंगे सियारों' का ! 

भूख कि छत तले 'आनंद' दब गया यारों,
दोष इसमें नही, टूटी हुई दीवारों का  !!

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

एक दिन

एक दिन...
चुपके से मेरे कान में
किसी ने यूँ ही कहा था
'तुम बहुत अच्छे हो' !!

वो मुलायम नरम सरगोशी
आज भी मुझको
बखूबी याद है
मैंने पाई है सजाये मौत जिससे
यही सरगोशी
तो वो जल्लाद है,

एक दिन
भटके मुशाफिर सी ख़ुशी
यकायक आई मेरी दालान में
उसी ने
यूँ ही  कहा था
तुम बहुत अच्छे हो !!

_आनंद द्विवेदी
३०-११-२०१० 

सोमवार, 29 नवंबर 2010

मैं ख़बरदार न होता तो भला क्या होता



आपसे प्यार न होता, तो भला क्या होता,
मैं गुनहगार न होता तो भला क्या होता !

चश्मे-नरगिस उठा के यूँ झुका लिया उसने
हाय  इज़हार न होता, तो भला क्या होता !

किसी की आँख  में सावन बसा के, भूल गए
ये इन्तजार  न होता तो भला क्या होता  !

हर तरफ जिक्र है  तेरी निगाहे-खंजर का,
जिगर के पार न होता, तो भला क्या होता !

आपकी आंख के ये  मयकदे  कहाँ  जाते  ?
मैं जो मयख्वार न होता, तो भला क्या होता !

जिधर भी देखिये रुसवाइयों का रोना  है
मैं खबरदार न होता तो भला क्या होता !

मैंने भी चाँद को छूने कि इज़ाज़त माँगी
आज  इंकार न होता, तो भला क्या होता !

ख़्वाब 'आनंद' ने देखा तो  वफ़ा का देखा
ख़्वाब बेकार न होता तो भला क्या होता !

- आनंद