रविवार, 30 अप्रैल 2017

(ना)उम्मीदें

फिर से ज़ख़्म उभारोगे क्या
अपना भी कुछ हारोगे क्या

मरने से पहले कुछ जी लूँ
तुम भर आँख निहारोगे क्या

किया धरा सब इन नज़रों का 
कुछ ग़लती स्विकरोगे क्या 

ऐसे धड़कन ना रुक जाये
जिद्दी लटें, सँवारोगे क्या

मंथर शांत नदी है इस पल
अपनी नाव उतारोगे क्या

जनम जनम की बातें छोड़ो
कुछ पल साथ गुजारोगे क्या

वहशत के डर से तुम मुझको
चौखट से  ही  टारोगे क्या

बंजारा है प्रेम जगत में
थोड़े वक़्त सँभारोगे क्या

दुनिया मुझको पागल समझे
तुम भी पत्थर मारोगे क्या

जब 'आनंद' चला जायेगा
उसको कभी पुकारोगे क्या

- आनंद

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

एक सिपाही की ग़ज़ल

दुनिया की सरकारों मुझको
चलो दाँव पर डारो मुझको

मैं फौजी अनुशासन मे हूँ
आप जुए में हारो मुझको

मैं जवान हूँ , मैं किसान हूँ
मारो  मारो,  मारो मुझको

जब भी हक़ की बात करूँ तो
चौखट से दुत्कारो मुझको

उल्टे सीधे प्रश्न करुँ तो
चलो जेल में डारो मुझको

कोई काम बनाना हो जब
धीरे से  पुचकारो मुझको

मेरे हिस्से फूल कहाँ हैं
काँटों तुम्ही सँवारो मुझको

धन्नासेठों की रक्षा में
नाहक आप उतारो मुझको

घर की जंग लड़ी न जाये
सरहद पर ललकारो मुझको

- आनंद

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

तुम्हारी जय होवै ..

देशी कृपानिधान तुम्हारी जय होवै
निकल रही है जान, तुम्हारी जय होवै

जेड श्रेणी जेड प्लस श्रेणी वाले भगवन
पत्थर खाय जवान तुम्हारी जय होवै

अन्न उगाने वाला तिल तिल मरता है
पीता मूत किसान तुम्हारी जय होवै

योग भोग मदिरा मोटर, वैभव वालों
खा लेना इंसान तुम्हारी जय होवै

ये सारे जयकारे गाली हैं, जब तक
दुखी किसान जवान तुम्हारी जय होवै

हे जनसेवक हे दुखभंजन हे अवतारी
कहाँ आँख और कान तुम्हारी जय होवै !

- आनंद

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

तन्हा क़दम बढ़ाना आया

तन्हा क़दम बढ़ाना आया
समझो दर्द भगाना आया

जिसने खुद ही राह बनायी
उसके साथ ज़माना आया

तुम क्यों इतनी दूर खड़े थे
जब जब ठौर ठिकाना आया

उस दिल पर क्या गुजरी होगी
जिसको धोखा खाना आया

कुछ तो ख़्वाब यार ने तोड़े
खुद कुछ भरम मिटाना आया

बरसों खुद से लड़ा मुक़दमा
तब जाकर मुस्काना आया

इक पूरे जीवन के बदले
दो पल का हर्ज़ाना आया

हमने ही ये आग चुनी है
तुमको कहाँ जलाना आया

जीवन भर का हासिल ये है
बस मन को समझाना आया

ये 'आनंद' उसी का हक़ है
जिसको भाव लगाना आया

- आनंद

मंगलवार, 28 मार्च 2017

झूठ या सच राम जानें...

झूठ या सच राम जानें, मुस्कराना आ गया
ज़िन्दगी आखिर तेरा हर ग़म उठाना आ गया

कौन हो-हल्ला करे किसको पुकारे साथ को
अब मुझे तनहाइयों से घर सजाना आ गया

इसमें रत्ती भर हमारे यार की गलती नहीं
अपनी उम्मीदें ही बैरी थीं, मिटाना आ गया

आज भी आँखें छलक आयीं किसी के नाम से
मैने समझा था मुझे सबकुछ भुलाना आ गया

शोखि़यों के ज़िक्र से अब भी बहक सकता हूँ मैं
फ़र्क इतना है बहक कर होश आना आ गया

आजकल सुर्खाब के पर लग गये हैं देश को
तन्त्र को अब लोक की भेड़ें चराना आ गया

शायरों में भी सियासत की कदर बढ़ने लगी
अब मुखौटे शायरी को भी लगाना आ गया

प्यार के दो बोल सुनने को तरसता उम्र भर
जब चला 'आनंद' मातम को जमाना आ गया

- आनंद