शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

दिये का जलना !


दिये का जलना
अभिमान नहीं है
(अँधेरा भगाने का )
बड़प्पन नहीं है
(प्रकाश फैलाने का)
दर्द भी नहीं है
(पीड़ा से जलने का )
यह एक सहज क्रिया है
जिसमें शामिल है तीन
एक आग जो जलाती है
एक बाती जो जलती है
एक माध्यम जो बहता है
दोनों के बीच

तुम आग हो
प्रेम माध्यम है
और मैं बाती
जलना सुखद है
दिये का मतलब ही है जलना
उसकी पहचान है यह

दिया बुझता कहाँ है
बुझती है आग
तुम न होते
तो ये सुख
नहीं होता मेरे नसीब में
एक बुझे दिये की पीड़ा से बचाकर
मुझे जलाये रखने के लिए
दिल से शुक्रिया मेरे मीत !

- आनंद


गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

चाहतें ......!

   

चाहते हैं कि
थमने का नाम नहीं ले रही
जिंदगी है कि
छदाम देने को राजी नहीं
दिल है कि
जान लेकर ही मानेगा
तुम हो कि
कोई फर्क ही नहीं पड़ता
 ...  

ना जाने... कितना बड़ा होता है
एक आदमी,
खाक़ नहीं होता
वर्षों जलने के बाद भी,
रक्तबीज की तरह
जिन्दा हो उठता है
अपनी ही
किसी चाहत से फिर
...

कुछ न चाहना भी
एक चाहत है
तुम्हारी नज़रों में
थोड़ा और भला बनने के लिए
मिटने की चाहत भी
एक चाहत है
हमेशा बने रहने की
...

आ जाओ मृत्यु
सौंप दूं तुम्हें, अपनी
हर चाहत
कि जिंदगी को
इनमे से, एक भी
स्वीकार्य नहीं
और ना ही स्वीकार है मुझे
इनमें कोई संसोधन
...

कुछ चाहतें
चाहतें नहीं होती
दरअसल
वो जीवन होती हैं
मुझे भी पहले
ये बात पता नहीं थी

 - आनंद






सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

वरदान अकेलापन !

जिस अकेलेपन को 
जीवन भर कोसता रहा
दुख मनाता रहा जिसका
वही अब  सुख है
अमृत है,

नहीं होता जब कहीं कोई
पसरता है मीलों सन्नाटा
छूट जाती है दुनिया पीछे
छूट जाता है सारा कारोबार
सपने, आशाएँ
उदासियाँ निराशाएँ … भय
सब के सब

तब
अचानक आकर तुम्हारा अहसास
लिपट जाता है रूह से मेरी
मैं जीता हूँ तुमको …पा लेता हूँ खुद को,
निपट तन्हाई में तुम और मैं
आख़िर यही तो थी मेरी कल्पना
युगों से
जन्मों से,

एक सोच
एक जीवन
और एक दुनिया,
जादूगर!
तुम चाहो तो क्या नहीं बदल सकते !!

- आनंद

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

अकथ

मैंने कह दिया,
लेकिन
कह पाया
केवल खुद को
नहीं नहीं
खुद की इच्छाओं को,

अकथ
आज भी
नहीं कहा जा सका मुझसे
मैं ये क्या कह रहा हूँ
और क्यों ?

पर... क्या मैं
कह रहा हूँ ये सब,
मैं तो तुम हो गया हूँ
प्रियतम

ये कहना भी
अर्चन है तुम्हारा
मेरे मंदिर के घंटियों की ध्वनियाँ
इन्हें  बेतरतीब ही
स्वीकार लो !

- आनंद  

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

मुस्कराते ख़्वाब !

नींद में ही था
कि तुम्हारी याद
छिड़क कर भाग गयी
एक चुटकी मुस्कराहट
होठों पर, 
पर...तुम तो सैकड़ों कोस दूर हो
ये कौन सुबह सुबह नाक दबाकर भाग गया फिर ?

ये मुस्कराहटें...
कब बोयी थी तुमने हमारे लिए
अब एकदम लहलहा रही हैं
धान की पकी बालियों की तरह !
तुम्हारे अहसासों की पाग बाँध
मैं भी निकल पड़ा हूँ
खेतों की तरफ
सुनूँगा गन्ने की पत्तियों की सरसराहट
देखूँगा बालियों का नाचना
कातिक की इस सोना बिखेरती दोपहर भर
पड़ा रहूँगा किसी मेंड़ पर,

खेलूँगा सारा दिन तुम्हारी यादों से
बार बार हटा दूंगा
तुम्हारे चेहरे पर आती वो शरारती लट,
दिखाऊंगा तुम्हें 
नहर किनारे टहलता हुआ 
सारस का जोड़ा,
जलमुर्गी और टिटिहरी के अंडे,
दूर चटक नीले आसमान के नीचे
उड़ता हुआ सफ़ेद हवाई जहाज...,
उससे जरा नीचे पक्षियों के भागते झुंड,
छील छील कर खिलाऊंगा
अपने हाथ से तोड़कर कच्चे सिंघाड़े
और नज़रें बचाकर झाँकूंगा तुम्हारी आँखों में ...

बस
उसके बाद
या तो और ख़्वाब देखूँगा
या फिर
कोई ख़्वाब नहीं देखूँगा !

- आनंद