मंगलवार, 8 मार्च 2011

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ......



आओ कुछ और करें ..


क्रांति कर दिया हमने तो
अरे महिलाओं की बात कर रहा हूँ.....
एकदम बराबरी का दर्ज़ा  दे दिया जी
कई कानून बना दिए इसके लिए
अब औरत को दहेज़ के लिए नहीं जलाया जा सकता
कार्यालयों में उसके साथ छेड़खानी नहीं की जा सकती
उसके कहीं आने जाने पर पाबन्दी नहीं है
और तो और ...
हमने सेनाओं में भी उसके लिए द्वार खोल दिया हैं
वगैरह वगैरह!
वो जरा सी अड़चन है नहीं तो
उसे ३० प्रतिशत आरक्षण भी देने वाले हैं 'हम '
दोस्तों!
न जाने क्यूँ मुझे लगता है
कि नाटक कर रहे हैं हम
बढती हुई नारी शक्ति से हतप्रभ हम
उसे किसी न किसी तरीके से
बहलाए रखना चाहते हैं...
उसे उसकी स्वाभाविक स्थिति से
आखिर कब तक रोकेंगे हम ...?
वो जाग गयी है अब 
और हमने पुरुष होने का टप्पा बांधा हुआ है आँखों पर,
गुजारिश है कि अब हम
उसे कुछ और न  ही दें तो अच्छा है.
वो वैसे ही बहुत कृतज्ञ है हमारी
हर जगह हमारी भूखी निगाहों से बचते हुए 
बगल से निकल जाने पर बे वजह धक्का खाते हुए
बसों में ट्रेनों में ,
स्कूल जाते हुए, आफिस जाते हुए
बाज़ार जाते हुए,
"उधर से नहीं उधर सड़क सुनसान है "
 जरा सा अँधेरा हो जाये तो ...
 ऊपर से सामान्य पर अन्दर से कांपते हुए ...
वो हर समय
हमारी कृतज्ञता महसूस करती है...


अगर सच में हमें कुछ करना है
तो क्यूँ न  हम यह करें ...कि
दाता होने का ढोंग छोड़ कर
उनसे कुछ लेने कि कोशिश करें
मन से उनको नेतृत्त्व सौप दें
कर लेने दें उन्हें अपने हिसाब से
अपनी दुनिया का निर्माण
तय कर लेने दें उन्हें अपने कायदे
छू लेने दें उन्हें आसमान
और हम उनके सहयात्री भर रहें ...
दोस्तों !
आइये ईमानदारी से इस विषय में सोंचें !!

            ----आनंद द्विवेदी ०८/०३/२०११

5 टिप्पणियाँ:

  1. 'मन से उनको नेतृत्व सौंप दें
    कर लेने दें उन्हें अपने हिसाब से
    अपनी दुनिया का निर्माण '
    यही हमारा सच्चा सहयोग होगा ......सच कहा द्विवेदी जी |

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  2. आपका समर्थन और सहयोग सिरोधार्य है सुरेन्द्र भाई जी.

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  3. kyaa aap ki yae kavitaa naari kavita blog par aap ke naam kae saath repost kar saktee hun ???

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  4. सुन्दर कथन काश लोग इस पर अमल कर पाते

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  5. ऐसा वही लिख सकता है जो मन से स्त्रियों का सम्मान करता है और उदार-ह्रदय है. फेमिनिस्ट होने के लिए किताबें पढ़ना ज़रूरी नहीं, बस एक संवेदनशील ह्रदय ही काफी है.

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