रविवार, 31 मार्च 2013

कोई तो ख़्वाब आँख में पलने के लिए दे

कोई तो ख़्वाब आँख में पलने के लिए दे
इक आरज़ू ही दिल को मचलने के लिए दे

दो चार रोज़ से मैं परेशान नहीं हूँ
इतना न मुझे वक़्त संभलने के लिए दे

तूफ़ान कोई और खड़ा कर मेरे मौला
क़िस्सा कोई महफ़िल में उछलने के लिए दे

माना कि मेरे बस का नहीं आग़ का दरिया
थोड़ी सी आंच फिर भी पिघलने के लिए दे

कितने बदल गए हैं सभी जिंदगी के रंग
मुझको भी जरा वक़्त बदलने के लिए दे

ये सारी कायनात तू  अपने ही पास रख
दो गज़ जमीन खाक़ में मिलने के लिए दे

वो राह जो मुमकिन ही नहीं है कहीं पहुंचे
वो रास्ता 'आनंद' को चलने के लिए दे

-आनंद

4 टिप्‍पणियां:

  1. दो-चार रोज से मैं परेशान बड़ी/बड़ा हूँ...
    कुछ वक्त मुझे तू भी सँभलने के लिए दे...!!

    बहुत खूब....आनंद...

    हर शेर मुकम्मल है...हर शेर है उम्दा...
    तारीफ करूँ मैं...मुझे अल्फाज़ नहीं मिलते..

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  2. जीवन से जुड़ी सच्चाई को व्यक्त करती रचना
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई
    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों ख़ुशी होगी

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  3. Sir really aapne bht shi lkha bs ek khwaab hi to chaiye hme jo aankhon mein hmre saj ske hme kch krne k lye prerit kre...
    Aapka shukrya itni sndr panktiyon k liye.....

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