मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

आनंद मिल भी जाएगा वो पास ही तो है

ख्वाबों सा टूटकर कभी ढहकर भी देखिये
जीवन में धूपछाँव को सहकर भी  देखिये

माना कि प्रेम जानता है मौन की भाषा
अपने लबों से एकदिन कहकर भी देखिये

धारा के साथ-साथ तो बहता है सब जहाँ
सूखी नदी  के साथ में बहकर भी देखिये

अपना ही कहा था  कभी इस नामुराद को
अपनों की बाँह को कभी गहकर भी देखिये

जन्नत से  देखते हो दुनिया के तमाशे को
कुछ वक्त  मेरे साथ में   रहकर भी देखिये

'आनंद' मिल भी जाएगा  वो  पास ही तो है
अश्कों की तरह आँख से बहकर भी देखिये

-आनंद
१५-१०-२०१२ 

6 टिप्‍पणियां:

  1. "ख्वाबों सा टूटकर कभी ढहकर भी देखिये
    जीवन में धूपछाँव को सहकर भी देखिये"
    सही में...जिंदगी में सभी रंगों का होना जरुरी है...तो आनंद आए इस सफर का |

    सादर |

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  2. बहुत ही बढियां गजल सर जी..
    एक-एक शेर बेहतरीन...
    :-)

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  3. बधाई , नवरात्र मंगलमय हो .
    प्रश्न विचारणीय है ..

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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