गुरुवार, 27 सितंबर 2012

टपकती छत से ...

पानी की  एक बूँद
छत से चली
मुझे देखते हुए
मैं भी देख रहा था उसे ही
आकर आँख के नीचे गिरी
टप्प !
थोड़ी देर बाद एक और चली
मगर मैंने
इस बार लगा दी थी थाली
ठम्म
इस बार वो बंट गयी
सैकड़ों हिस्सों में
मैंने देखा
एक को अनेक होते हुए

ऐसे ही
तेरी याद की एक छोटी सी बूँद
जब भी टकराती है
मेरे पत्थर हो चुके जेहन से
न जाने कितने रंग रूप  और हिस्से
हो जाते हैं
फिर यादों के |

- आनंद 

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 29/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. न जाने कितने रंग रूप और हिस्से
    हो जाते हैं
    फिर यादों के |

    एक बार जो आ जाये ...गहराती ही है ....
    सुंदर अभिव्यक्ति ...आनंद भाई ...

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  3. भावनाओं को उपमाओं में बहुत
    ही खूबसूरती से पिरोया है आपने....
    बहुत बेहतरीन रचना...
    :-)

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  4. लाजवाब....गहरे भाव..सीधे दिल में उतरती हुई |

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  5. वाह आनंदजी बहुत ही बेहतरीन रचना पढ़ी आज...बहुत बहुत बधाई

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  6. जेहन ही पत्थर हुआ है दिल नहीं ... समा जाएगी कभी ये बूंद मन मरुस्थल में .... गहन अभिव्यक्ति

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  7. pathar se hue jehan ko ret ka bana do bhaiya... sareee bunde sama jayegi:)

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  8. भाई आनंद जी बहुत सुन्दर कविता और हमारे ब्लॉग सुनहरी कलम पर आने के लिए आभार |

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  9. भाव, भाषा एवं अभिव्यक्ति सराहनीय है। मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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