बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

अपने से दूर तुझको किधर ढूंढ रहा हूँ

मंज़िल  के  बाद  कौन  सफ़र  ढूंढ  रहा हूँ
अपने  से  दूर  तुझको  किधर  ढूंढ  रहा हूँ

कहने को शहर छोड़कर सहरा में आ गया
पर   एक    छाँवदार  शज़र  ढूंढ  रहा   हूँ

जिसकी नज़र के सामने दुनिया फ़िजूल है
हर शै  में  वही  एक  नज़र  ढूंढ  रहा  हूँ

लाचारियों का हाल तो देखो कि इन दिनों
मैं दुश्मनों  में  अपनी  गुजर  ढूंढ  रहा  हूँ

तालीम  हमने पैसे  कमाने  की दी  उन्हें
नाहक  नयी  पीढ़ी  में  ग़दर  ढूंढ  रहा हूँ

जैसे शहर में  ढूंढें  कोई  गाँव वाला  घर
मैं मुल्क  में  गाँधी का असर ढूंढ रहा हूँ

यूँ गुम हुआ कि सारे जहाँ में नहीं मिला
'आनंद' को  मैं  शामो-सहर  ढूंढ रहा हूँ

- आनंद
०२/१०/२०१२ 

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत अच्छे शेर...खासकर ये वाला
    जैसे शहर में ढूंढें कोई गाँव वाला घर
    मैं मुल्क में गाँधी का असर ढूंढ रहा हूँ

    उत्तर देंहटाएं

  2. जिसकी नज़र के सामने दुनिया फ़िजूल थी
    हर शै में वही एक नज़र ढूंढ रहा हूँ
    Sabhee ashar kamal ke hain!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
    अभिव्यक्ति......

    उत्तर देंहटाएं