शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

गालों का गुलाल

एक दिन जब
मुस्कराता हुआ ईश्वर
मेरी रूह पर वैधानिक चेतावनी सा
गोद रहा था ..प्रेम
मैं उसके हाथ से फिसल कर गिरा तुम्हारी मुंडेर पर
जहाँ तुमने धूप में डाल रखे थे अपने सतरंगी सपने
खुश्बुओं के परिंदों के लिए बिखेरे हुए थे
खिलखिलाहटों के दाने
उड़ते हुए दुपट्टे पर तैर रही थी
खुशियों और शैतानियों की जुगलबंदियाँ
तुम्हारी पलकों की गीली कोरों पर फँसी एक नन्ही बूँद
मेरी राह में आकर बोली
ऐ मुसाफ़िर... मैं ही हूँ तुम्हारी मंजिल
और आहिस्ता आहिस्ता नसों में उतर गया
तुम्हारे सुर्ख़ गालों का सारा ग़ुलाल
फिर एक दिन मैंने देखा
रुमाल में टँके गुलाब के नीचे अपने नाम का पहला अक्षर!

ओ मेरी जिंदगी
ले चल मुझे वहीं, जहाँ तूने कभी बो दिए थे
रेशमी बटुए से निकाल कर अपने अरमान
इससे पहले कि निर्मोही समय
हाथ छुड़ाकर निकलने की कोशिश करे
मुझे लौटानी हैं, किसी की उम्र भर की अमानतें
किताबों के बीच छुपाये गए बेशकीमती अहसास
आँखों मे कुछ चुलबुले ख़्वाब
और ढेर सारी नादानियों और शोखियों से भरी उसकी तमाम तस्वीरें ।

चल जल्दी चल
कि हमें रोपने हैं अभी भरोसे के कई पौधे 
और चहचहाते पंछियों से लेनी हैं
ढेर सारी दुआएँ !!

© आनंद

6 टिप्‍पणियां:

  1. इससे पहले कि निर्मोही समय
    हाथ छुड़ाकर निकलने की कोशिश करे
    मुझे लौटानी हैं किसी की
    उम्रभर की अमानतें
    किताबों के बीच छुपाए बेशकीमती अहसास.....
    बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति !

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  2. वाह !!!
    बेहद सुन्दर लाजवाब अभिव्यक्ति...

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