सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

मेरे अंदर के इंसान

ओ मेरे अंदर के इंसान

ओ गंवई, गंवार भलेमानुष-अमानुष
किसी माल में न जाने के कितने भी बहाने ढूंढ ले तू
किसी बड़ी कार में किसी आग्रह/जरूरत वश बैठते समय कितना भी सिमटे तू
किसी अच्छे आफ़िस का दरवाजा खोलते हुए कितना भी ठिठकें तेरे कदम
दुकान पर मोलभाव न कर पाने के लिये
घर आकर कितनी भी डाँट पड़े तुझे
घर के शेर , घिग्घी बंध जाती है बाहर, दब्बू .....
कोई भी अलंकरण मिले तुझे
कितनी ही बार ठगा जाए तू .... छला जाए तू  
मैं हूँ तेरे साथ ..... तब तक
जब तक तुझे मजदूरों के साथ जमीन पर बैठने में भला लगता रहेगा
तेरे पुरखों के खेत जोतने वाले बुद्दू/भीखा/रग्घू/ सजीवन, को
'काका राम-राम' कहने में भला लगता रहेगा
किसी गरीब को गले लगाते समय तेरा प्रेम का सोता सूखेगा नहीं
तू करता रहेगा विरोध
किसी कमजोर को बेवजह घुड़कने का, सताने का, धोखा देने का
देखता रहेगा दुनिया को जाति से बाहर निकल कर भी
देखता रहेगा धर्म के प्रपंचों को कभी कभार धर्म से थोड़ा दूर खड़े होकर
कि जब तक तू स्त्रियों का शरीर पढ़ने के बजाय
पढ़ता रहेगा उनका चेहरा, उसपर लिखा उनका संघर्ष  और उनके जीवन की दुश्वारियाँ
सुंदर देहयष्टि की जगह, साहस को, सहनशक्ति की सीमा को
और साथ ही उनकी अद्भुत क्षमताओं को ( जो प्रकृति ने पुरुषों को नहीं दिया )
मैं हूँ तेरे साथ छाया की तरह

ओ मेरे अंदर के इंसान
ज़मीर के साथ जीते हुए
परिस्थितियों से हार जाना तुम चाहे रोज
मगर मत चुनना कभी
निर्लज्ज सुख
मैं हूँ तेरे साथ
नहीं दूंगा धोखा तुझे
तू भी मत देना किसी को
मुझको भी नहीं !

- आनंद




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