शनिवार, 15 सितंबर 2012

आज अख़बार भी लगते हैं

तेरी राहों में  कभी था जो  उज़ालों की तरह
हाल उसका भी हुआ  चाहने वालों की तरह

उम्र भर याद तो आया वो किसी को लेकिन
या हवालों की तरह या तो सवालों की तरह

जरा  भी  जोर  से  रखा  तो  टूट  जाएगा
दिले नाशाद हुआ चाय के प्यालों की तरह

बहुत गरीब  हैं  साहब ,  मगर  कहाँ   जाएँ
मुल्क को हम भी जरूरी हैं घोटालों की तरह

जब तरक्की के लिये बैठकों का  दौर चला
जिक्र गाँवों का हुआ नेक खयालों की तरह

किस से उम्मीद करें, साफ़  बात  कहने की
आज अख़बार भी लगते हैं दलालों की तरह

-आनंद
१३-०९-२०१२ 

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया....
    दाद कबूल करें...

    सादर
    अनु

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  2. बहुत बढ़िया रचना...
    किस से उम्मीद करें, साफ़ बात कहने की
    आज अख़बार भी लगते हैं दलालों की तरह
    बेहतरीन
    :-)

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  3. बहुत गरीब हैं साहब , मगर कहाँ जाएँ
    मुल्क को हम भी जरूरी हैं घोटालों की तरह

    जब तरक्की के लिये बैठकों का दौर चला
    जिक्र गाँवों का हुआ नेक खयालों की तरह

    बहुत खूब ....

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  4. उम्र भर याद तो आया वो किसी को लेकिन
    या हवालों की तरह या तो सवालों की तरह

    बहुत बढ़िया

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  5. जब तरक्की के लिये बैठकों का दौर चला
    जिक्र गाँवों का हुआ नेक खयालों की तरह....bahot achche.....

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  6. इस रचना में जिंदगी का हर रंग लिख दिया ...प्रेम में प्रेमी का
    सरकार में घोटालों का ....कृष्ण का ग्वालों का ...गावं और शहर का ...बहुत खूब

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  7. तेरी राहों में कभी था जो उज़ालों की तरह
    हाल उसका भी हुआ चाहने वालों की तरह....

    आगाज़ तो अच्छा है अंजाम खुदा जाने.....!!
    भावों की अभिव्यक्ति आपसे बेहतर कौन कर सकता है....???
    बहुत सुन्दर...

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  8. बहुत गरीब हैं साहब , मगर कहाँ जाएँ
    मुल्क को हम भी जरूरी हैं घोटालों की तरह||
    बहुत बढ़िया ,लाजवाब रचना

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  9. मैं तो चाहूँगा मुझे एक बार फिर भेजो
    नंद की गाय चराते हुए ग्वालों की तरह

    ...बहुत सुन्दर! लाज़वाब रचना...

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