शुक्रवार, 11 मई 2012

आख़िरी ख़त जला रहा हूँ मैं


मुस्कराहट बहुत जरूरी है,  इसलिए   मुस्करा रहा हूँ मैं,
यार कोई तो मर्सिया पढ़ दो, आख़िरी ख़त जला रहा हूँ मैं |

कितनी हसरत से एक दिन मैंने, तेरे कूचे में घर बनाया था,
'वक़्त की बात' इसे कहते हैं, अब वही घर जला रहा हूँ मैं  |

रक्खे रक्खे ख़राब होने हैं, ख्वाब अब काम के नही मेरे,
सोंचता हूँ के बेंच दूं इनको, आज बाज़ार जा रहा हूँ मैं  |

मंजिलें कब किसी कि होती हैं, साथ अपने सफ़र ही रहता है,
आओ तन्हाइयों यहाँ से चलें, अब कहीं और जा रहा हूँ मैं |

जिन्दगी! वाह जिंदगी मेरी, तू भी उसकी हुई तो हो ही गयी,
पहले दिल था जहाँ पे सीने में, अब मज़ारें बना रहा हूँ  मैं |

लाख 'आनंद' से कहा मैंने,  तू उसे भूल क्यों नही जाता,
सिरफिरा रोज यही कहता है, सारी दुनिया भुला रहा हूँ मैं |


-आनंद
०९/०५/२०१२ 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खुबसूरत एहसास पिरोये है अपने......

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  2. उस से गैर ने की बेवफाई,तो मेरी शामत आ गई
    आग हो जाते हैं वो ,मेरी वफ़ा को देख कर |

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  3. सुन्दर शेर....अच्छा चित्रण किया है आप ने...सुन्दर प्रस्तुति... बहुत बहुत बधाई...

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  4. ख्बाब बेचने निकल लिये! वाह!

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  5. आप सभी मित्रों का हार्दिक आभार !

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  6. बहुत शानदार दिल को छु लेने वाली। आंखे भिगो दी।

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