सोमवार, 29 नवंबर 2010

मैं ख़बरदार न होता तो भला क्या होता



आपसे प्यार न होता, तो भला क्या होता,
मैं गुनहगार न होता तो भला क्या होता !

चश्मे-नरगिस उठा के यूँ झुका लिया उसने
हाय  इज़हार न होता, तो भला क्या होता !

किसी की आँख  में सावन बसा के, भूल गए
ये इन्तजार  न होता तो भला क्या होता  !

हर तरफ जिक्र है  तेरी निगाहे-खंजर का,
जिगर के पार न होता, तो भला क्या होता !

आपकी आंख के ये  मयकदे  कहाँ  जाते  ?
मैं जो मयख्वार न होता, तो भला क्या होता !

जिधर भी देखिये रुसवाइयों का रोना  है
मैं खबरदार न होता तो भला क्या होता !

मैंने भी चाँद को छूने कि इज़ाज़त माँगी
आज  इंकार न होता, तो भला क्या होता !

ख़्वाब 'आनंद' ने देखा तो  वफ़ा का देखा
ख़्वाब बेकार न होता तो भला क्या होता !

- आनंद

5 टिप्‍पणियां:

  1. 'आपकी आँख से छलकी शराब क्या होती ?

    मैं जो मयख्वार न होता तो भला क्या होता '

    *******************************

    वाह द्विवेदी जी ! गज़ब का शेर है .....सभी शेर बेहतरीन

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  2. 'कलमकार'को इस रचनात्मकता हेतु बधाई!

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  3. "....ye intezar na hota to bhala kya hota .." bahut khubshurat andaz-e-bayan, waah!

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  4. बड़ी खूसूरत गज़ल है......
    मैं तो बस इतना ही कहूँगी...

    "गर ये 'आनंद' न होता तो भला क्या होता......???"

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