शनिवार, 30 अगस्त 2014

मैं मुस्कराऊँगा

एक दिन मैं मुस्कराऊँगा
(मंद और स्मित मुस्कान)
तुम्हारी  उपलब्धियों पर
और सम भाव से
अपनी नाकामियों पर भी
मैं मुस्कराऊँगा
अपने जीवन पर
ईश्वर की योजनाओं पर
तुम्हारी उपेक्षाओं पर
अपने समर्पण पर
बीत गए समय पर
भविष्य के सपनों पर
अपने सभी अपनों पर ,

मैं निश्चित मुस्कराऊँगा
अपने पागलपन पर
दुनिया की बदक़िस्मती पर
अपने प्रेम पर
दोस्तों की दोस्ती पर
अपनी सभी चालाकियों पर
पहाड़ से दर्द पर
राई से सुकून पर
बेवज़ह जूनून पर
पिता की फटकार पर
माँ के दुलार पर ,

मैं निश्चित ही मुस्कराऊँगा
मंज़िलों की झूठ पर
रास्तों की लूट पर
ताज़े खिले गुलाब पर
अपने सबसे अच्छे ख़्वाब पर
फालतू शिष्टाचार पर
बहनों के प्यार पर
अपने हर कर्म पर
दुनिया के हर धर्म पर
अपनी हर बात पर
जो कभी नहीं हुई उस मुलाकात पर

इनमें से एक भी  नहीं है
मेरे मुस्कराने की वज़ह
मैं तो बस मुस्कराऊँगा
क्योंकि मुस्कराने के लिए नहीं चाहिए
ग़मों की तरह कोई वज़ह !

- आनंद

2 टिप्‍पणियां:

  1. जब कोई वजह ही नहीं तो एक दिन का इंतजार क्यों...

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुस्कुराने को भी क्या वजह चाहिए …
    खूब !

    उत्तर देंहटाएं