शनिवार, 13 अप्रैल 2013

ये ज़ख्म जरा और उभर आये तो अच्छा

ये  ज़ख्म जरा और  उभर आये  तो अच्छा
वो शख्स इधर होके गुजर जाए तो अच्छा

उसकी निगाहे-नाज़ बने क़त्ल का सामाँ
खंज़र की तरह दिल में उतर जाए तो अच्छा

जिसने भी कहा हो कभी, 'है इश्क़ ही ख़ुदा'
अब अपने बयानों में असर लाये तो अच्छा

वैसे तो वो मिसाल है अपने में आप ही
आदत भी अगर थोड़ी सुधर जाए तो अच्छा

सड़कों पे देर रात,  भटकती  है  एक  शै
उसके ज़ेहन में घर भी कभी आये तो अच्छा

'आनंद' यही इल्तिज़ा करता है रात दिन
तेरा लबों पे नाम हो मर जाए तो अच्छा

- आनंद




7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह......
    बहुत बहुत अच्छा......

    अनु

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  2. यह ग़ज़ल पढ़कर "ये ज़ुल्फ ज़रा खुल के बिखर जाए तो अच्छा" याद आ गया:) सड़कों पे देर रात... वाला शेर दमदार है।

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  3. बहुत सुन्दर....
    पधारें "आँसुओं के मोती"

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  4. सुंदर गजल
    आपकी इस प्रविष्टि क़ी चर्चा सोमवार [15.4.2013]के चर्चामंच1215 पर लिंक क़ी गई है,अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए पधारे आपका स्वागत है | सूचनार्थ..

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  5. kabhi koi hame jo jakhm de jata h par pir bhi na jaane kyn usi ka hame intezaar rehta hai...................
    wo shakhs idhar hoke guzar jaye to achaa....bahut khub

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