रविवार, 27 जनवरी 2013

'आनंद' मजहबों में सुकूँ मत तलाशकर...

जब तक है जाँ बवाल हैं सारे जहान के,
कितने ही ख़्वाब देख लिये इत्मिनान के।

ऐ जिंदगी  ठहर तू जरा , सोच के बता ,
कब हो रहे हैं ख़त्म ये दिन, इम्तिहान के ।

दुनिया के गलत काम का अड्डा बना रहा,
हम चौकसी में बैठे रहे जिस मकान के ।

जो अनसुने हुए हैं उसूलों के नाम पर,
मेरे लिए वो स्वर थे सुबह की अज़ान के ।

तेरे लिए भी ग़ैर हैं, खुद के ही  कब  हुए
ना हम ज़मीन के रहे, न आसमान  के ।

'आनंद' मजहबों में सुकूँ मत तलाशकर,
झगड़े अभी भी चल रहे  गीता कुरान के ।

- आनंद


2 टिप्‍पणियां:



  1. ऐ ज़िंदगी ठहर तू जरा , सोच के बता ,
    कब हो रहे हैं ख़त्म ये दिन, इम्तिहान के

    यही सवाल मैंने भी अक्सर पूछा है...
    लेकिन , ज़िंदगी न ठहरती है , न ही कुछ सोचती है ,
    न ही जवाब देती है ... ... ...


    बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आनंद जी !
    तमाम शेर काबिले-तारीफ !
    जानता हूं आपको तारीफ़ का कोई मोह नहीं
    :)
    शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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  2. आप सदा आदरणीय है दादा ..आपका आशिर्वाद तो अमूल्य है बेशक मेरी टिप्पड़ियों में रूचि नहीं है !

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