शनिवार, 9 अप्रैल 2011

क़तरा क़तरा एक समंदर सूख गया





लम्हा लम्हा करके लम्हा छूट  गया
क़तरा  क़तरा एक समंदर सूख गया  !

और हादसों के डर से, वो तनहा था  ,
तनहा तनहा रहकर भी तो टूट गया !

मैं कहता था न, ज्यादा सपने मत बुन, 
वही हुआ , सपनों का दर्पण टूट गया  !

फिर कोई मासूम सवाल न कर बैठे ,
बस इस डर से ही, मैं उससे रूठ गया  !

मेरी फाकाकशी  सभी को मालूम थी ,
फिर भी कोई आया  मुझको लूट गया

उसकी बातों से तो ऐसा लगता  था ,  
जैसे कोई दिल का छाला फूट गया !

जो 'आनंद' नज़र आता है, झूठा है ,
उसका सच तो कब का पीछे छूट गया !

  --आनंद द्विवेदी ०९/०४/२०११ 

8 टिप्‍पणियां:

  1. मैं कहता था न, ज्यादा सपने मत बुन,
    वही हुआ , सपनों का भांडा फूट गया !
    सपने तो हकीकत की बानगी होते हैं , सपनों का कैसा भांडा .... सपने टूटे तो नए सपने बुनो , आसमान पाने का ख्वाब बनाओ, सूरज मुट्ठी में होगा

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  2. लम्हा लम्हा करके लम्हा छूट गया
    कतरा कतरा एक समंदर सूख गया !

    और हादसों के डर से, वो तनहा था ,
    तनहा तनहा रहकर भी तो टूट गया !

    मैं कहता था न, ज्यादा सपने मत बुन,
    वही हुआ , सपनों का भांडा फूट गया
    Kya kamaal kee rachana hai! Kin,kin panktiyon ko dohraun?

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  3. ओये होये क्या गज़ब के शेर हैं । हर शेर हकीकत से मिलवाता है……………शानदार प्रस्तुति।

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  4. शानदार प्रस्तुति...गज़ब के शेर ...

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  5. उसकी बातों से तो ऐसा लगता था ,
    जैसे कोई दिल का छाला फूट गया !

    बहुत खूबसूरत गज़ल

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  6. …शानदार प्रस्तुति। .........."ला-जवाब" जबर्दस्त!!

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  7. पहली बार पढ़ रहा हूँ आपको और भविष्य में भी पढना चाहूँगा सो आपका फालोवर बन रहा हूँ ! शुभकामनायें

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  8. फिर कोई मासूम सवाल न कर बैठे

    बस इस डर से ही,मैं उससे रूठ गया

    ***********************

    द्विवेदी जी ,

    अच्छे भावों की रचना......हर शेर उम्दा.

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