सोमवार, 21 मार्च 2011

खुद जली, दिल जला गयी होली



फिर अदावत निभा गयी होली ,
खुद जली, दिल जला गयी होली !

रंग बरसा न फुहारें बरसीं ,
टीस मन में जगा गयी होली !

दर्द के श्याम, पीर की राधा,  
रंग ऐसा दिखा गयी होली  !

राह तकता रहा अबीर लिए ,
वो न आये, क्यूँ  आ गयी होली ?

उम्र भर तुम भी जलो, मेरी तरह 
बोलकर यह  सजा गयी होली !

वाह 'आनंद' की किस्मत देखो ,
दर्द को कर दवा गयी,  होली  !!

      --आनंद द्विवेदी  

10 टिप्‍पणियां:

  1. Anand ji aap bahut umda likhte hain,
    Badhai sweekaar karen.

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  2. दर्द के श्याम, पीर की राधा,
    रंग ऐसा दिखा गयी होली !

    राह तकता रहा अबीर लिए ,
    वो न आये, क्यूँ आ गयी होली ?
    Aah! Itna dard!!

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  3. हाँ क्षमा जी ऐसा ही कुछ है ....धन्यवाद !

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  4. 'उम्र भर तुम भी जलो मेरी तरह

    बोलकर यह सजा गयी होली '



    हर शेर बेहतरीन ......दर्द छलक रहा है , यही रचना की सार्थकता है |

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  5. holi to pighlati hai, bhigati hai.... .......bhaiya!! aapne to jalne ki baat kar di...:) holi ke rang to hame khushiyon se sarabor karne ke liye hoti hai................par aap to aap ho!! dard ke jadugar!! itna na dard ko kuredoo ki dard bhi hasne lage...:D

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  6. सुरेन्द्र भाई जी ,,,बहुत बहुत धन्यवाद ! और मुकेश मेरे भाई आपके पधारने से ही मैं कृतकृत्य हो गया हूँ और क्या कहूं ?

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  7. रंग बरसा न फुहारें बरसीं ,
    टीस मन में जगा गयी होली !
    दर्द के श्याम, पीर की राधा,
    रंग ऐसा दिखा गयी होली !.....

    बहुत सुन्दर शेर...बहुत सुन्दर भावपूर्ण ग़ज़ल...
    हार्दिक शुभकामनाएँ !!

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  8. डा. शरद जी !...आप जैसी शख्सियत का अकिंचन के ब्लोग पर पधारना ही अपने आप में महत्वपूर्ण है....ग़ज़ल भी पसंद आई तब तो मनो सोने पर सुहागा!
    हार्दिक आभार !

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  9. बेहतरीन अभिव्यक्ति ..
    बधाई भैया !

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