मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

'वो' नहीं था मैं...



यूँ खुश तो क्या था, मगर गमजदा नहीं था मैं,
तुम मुझे 'जो' समझ रहे थे, 'वो' नहीं था मैं |

मेरी  बर्बाद   दास्ताँ , है  कोई   ख़ास   नहीं,
जब मेरा घर जला, तो आस पास ही था मैं |

चंद  लम्हे, जो  मुझे  जान से  भी  प्यारे  थे,
उनकी कीमत पे मैं बिका,मगर सही था मैं |

दुश्मनो को भी सजा, प्यार की ऐसी न मिले,
मेरी चाहत थी कहीं और,और कहीं था मैं |

तुमने  बेकार   मेरा  क़द  बढा  दिया   इतना,
फलक तो क्या जमीन पर भी कुछ नहीं था मैं |

घर  उदासी  ने  बसाया है, जहां   पर  आकर,
शाम तक उस जगह 'आनंद' था, वहीं था मैं |

      -----आनंद द्विवेदी. २८/१२/२०१०

2 टिप्‍पणियां:

  1. चंद लम्हे, जो मुझे जान से भी प्यारे थे,
    उनकी कीमत पे मैं बिका,मगर सही था मैं!
    यह प्रतिबद्धता स्तुत्य है!

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  2. तुमने बेकार मेरा क़द बढा दिया, इतना,
    फलक तो क्या, जमीन पर भी कुछ नहीं था मैं!
    ये स्वीकारोक्ति व्यक्तित्व की विशालता की परिचायक है!

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