शनिवार, 20 जुलाई 2013

अपने तमाम जख्म छुपाते हुए मिला

अपने तमाम ज़ख्म छुपाते हुए मिला
इक शख्स मुझे 'दूर से' जाते हुए मिला

तेरा शहर तो खूब है मंजिल से राब्ता
जो भी मिला वो राह बताते हुए मिला

अब तक मेरे हबीब की आदत नहीं गयी
पहले की तरह ख़्वाब दिखाते हुए मिला 

उम्मीद के झोले में भरे ग़म की पोटली
कोई शहर में गाँव से आते हुए मिला

ग़म की फिकर करूँ या रंज़ यार का करूँ  
दुश्मन का काम दोस्त निभाते हुए मिला  

'आनंद' को जीने का सलीका नहीं आया   
जब भी मिला वो चोट ही खाते हुए मिला 

- आनंद 


1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सुंदर गजल

    यहाँ भी पधारे
    गुरु को समर्पित
    http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_22.html

    उत्तर देंहटाएं