गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

दर्द पन्नों पे उतरा किया मैं रातों को




याद में तेरी गुजारा  किया  मैं  रातों  को,
अपने ख्वाबों को संवारा किया मैं रातों को !

अपनी किस्मत में मुकम्मल जहान हो कैसे ,
बना - बना के बिगाड़ा  किया मैं रातों को  !

पास रहकर भी बहुत दूर बहुत दूर हो तुम,
दूर रहकर भी पुकारा किया मैं रातों को !

दर्द तुझमे भी है लेकिन वो किसी और का है,
तेरा वो दर्द  दुलारा  किया मैं  रातों  को !

तेरी रुसवाई भी कमबख्त भा गयी मन को,
इसी का लेके सहारा जिया मैं रातों को !

तुने मुझमे भी किसी और की झलक देखी,
तभी से खुद को निहारा किया मैं रातों को !

बड़ा हसीन सा 'आनंद' जिंदगी ने दिया,
दर्द पन्नों पे उतारा किया मैं रातों को !!

4 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी किस्मत में मुकम्मल जहान था ही नहीं

    बना-बना के बिगाड़ा किया मैं रातों को

    बहुत सुन्दर शेर ...बढ़िया ग़ज़ल

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  2. धन्यवाद सुरेन्द्र भाई ..प्रगति की समीक्षा भी आपको करते रहना है बंधुवर केवल तारीफ से काम नही चलेगा !

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  3. ab to sach mei sambhal kar baat karni hogi :P , ye Anand to sach mei us Anand se alag hai ... jokes apart , its reaaly very good , khub raaton ka hisaab rakha aapne .. especially for the people jo jaage umar bhar ratoon mein !! :(( .... thanks for sharing the same wid me !! I am priveleged really !!

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  4. hmmmmm Sabina ji really thanks to you thoda sa smaya nikal kar ise padhne ke liye.

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